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५०
 
श्रीशिवस्तोत्रेषु
 
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मृड श्रीश स्निग्धालिकनयन शुभ्राङ्ग भगव
न्
इतीह क्रन्दन्तं परमकृपया पालय विभो ॥ ९८ ॥
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नगाधीश त्र्यक्षाखिलशुभद गङ्गाधर विभो
 

शिव क्ष्वेलग्रीव द्युमणिशशभृद्वह्निनयन ।

महादेव स्वच्छस्फटिकमणिसच्छाय भगव
 
न्
इतीह क्रन्दन्तं परमकृपया पालय विभो ॥ ९९ ॥
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निरासङ्ग श्रीमन् निरवधिककारुण्यनिलय
 

प्रणामप्रीतान्तःकरणमुनिवृबृन्दैकशरण ।
 

वृषारूढ प्रौढप्रमथगणनाथाद्य भगव
 
न्
इतीह क्रन्दन्तं परमकृपया पाल्य विभो ॥ १०० ॥
 
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भूयोभूयः शरणं भूतेशोऽसौ भवाब्धिमन्ग्नस्य ।
 

अबलम्ब हीनमनसो हा हेति क्रोशतो ममेदानीम् ॥ १०१ ॥
 
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दुर्गाधीश ममेदं दौर्गत्यं दूरतो निरस्यैव ।
 

तव नामकीर्तनं मे तारकमेकं सदा दिशानन्दम् ॥ १०२ ॥
 
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सहजमहाराजपुरप्ग्रामनिवासी विवेकिमूर्धन्यः ।
 

श्रीवीरराघवाख्यः सङ्ख्यावान् स्तोत्रमेतदतनिष्ट ॥ १०३ ॥
 
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॥ इति श्रीशिवशतकं सम्पूर्णम् ॥
 
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५. ॥ अथ श्रीशिवस्तोत्रम् ॥
 
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अमरतटिनीतरङ्गमरीचिका-
 

चयक्रमपाटलीभवत्कचकलाप ।
 

समराङ्गणविवर्जितमरुद्वित्कोप
 

कमलसम्भव मुख्यगणविनुतबहुरूप ॥ १ ॥
 
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भूधरतनूजा पयोधरतटीगन्ध-
 

माधुर्यमाधुर्यसाधुवचन ।
 

श्री वराशिव कलानाथराजत्कलाश्रीधरा-
 

विनिभरा<add>[ऽऽविर्जला]</add>म्भोधरसमानगल <add>( ? )</add> ॥ २ ॥
 
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भक्तजनपालनव्यक्तकारुण्यरस-
 

चित्तविपुलकटाक्षश्रुतिनियुक्त ।
 
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