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४.
 
॥ अथ श्री सुब्रह्मण्यभुजङ्गस्तोत्रम् ॥
 
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भजेऽहं कुमारं भवानीकुमारं
 

गलोल्लासिहारं नमद्दृग्विहारम् ।

रिपुस्तोमहारं नृसिंहावतारं
 

सदा निर्विकारं गुहं निर्विचारम् ॥ १ ॥
 
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नमामीशपुत्रं जपाशोणगात्रं
 

सुरारातिशत्रुं रवीन्द्वग्निनेत्रम् ।

महाबर्हिपत्रं नि<delete>वा</delete><add>[जा] </add>स्याब्जमित्रं

प्रभास्वत्कलत्रं पुराणं पवित्रम् ॥ २ ॥
 
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अनेकार्ककोटिप्रकाशं ज्वलन्तं
 

मनोहारिमाणिक्य भूषोज्ज्वलं तम् ।

श्रितानामभीष्टं दिशन्तं नितान्तं
 

भजे षण्मुखं तं शरच्चन्द्रकान्तम् ॥ ३ ॥
 
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कृपावारि कल्लोलभास्वत्कटाक्षं
 

विराजन्मनोहारिशोणाम्बुजाक्षम् ।
 

प्रयोगप्रवाह प्रदानैकदक्षं
 

भजे कान्तिकान्तं परस्तोम<delete>र</delete><add>[रू]</add>क्षम् ॥ ४ ॥
 
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सुकस्तूरिका <delete>सिन्धु </delete><add>[बिन्दु ] </add>भास्वल्ललाटं
 

दयापूर्णचित्तं महादेवपुत्रम् ।

रवीन्दूल्लसद्रत्नराजत्किरीटं
 

भजे क्रीडिताकाशगङ्गामकूटम् ॥ ५ ॥
 
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सुकुन्दप्रसूनावलीशोभितान्तं
 

शरत्पूर्ण चन्द्रास्यषट् कान्तिकान्तम् ।
 

शिरीष प्रसूनाभिरामं भवन्तं
 

भजे देवसेनावलीवल्लभं तम् ॥ ६
 
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सुलावण्यतः सूर्यकोटी<delete>रनीशं </delete><add>[निकाशं ]
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प्रभुं तारकारिं द्विषड्बाहुमीशम् ।

निजार्कप्रभादीप्यमानापदानं
 

भजे पार्वतीप्राणपुत्रं सुरेशम् ॥ ७ ॥
 
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