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श्रीगणेशाष्टकम्
 
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अजं तुन्दिलं व्योमधर्मोपमेयं

भृशं दन्तपाणिं '1सुजातैकदन्तम् ।

गले हास्तिकं नागयज्ञोपवीतं
 

सदानन्दरूपं गणेशं भजेऽहम् ॥ २ ॥
 
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विभुं निर्मलं <ref>2</ref>शर्वपुत्रं सुरेशं
 

शिवं शूलिवत्सं गणेशानमीशम् ।

क्व
त्किङ्किणीनादपादौ वहन्तं
 

सदानन्दरूपं गणेशं भजेऽहम् ॥ ३ ॥
 
</verse>
<verse><flag>
दौर्वे</flag>ष्ठितं विघ्नविध्वंसुवर्गैः
 

सुरैर्मण्डितर्यज्ञयज्ञोत्तमाङ्गम् <add>( ? )</add>

गुणातीतमव्यक्तमेकं तुरीयं
 

सदानन्दरूपं गणेशं भजेऽहम् ॥ ४ ॥
 
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नरं सिन्धुरं पञ्चवक्त्रं विचित्रं
 

वयोयोगिनं भोगनाथं <add>[ महेशम् ]</add>

करं कारिणं कामिनं नागरूपं
 

सदानन्दरूपं गणेशं भजेऽहम् ॥ ५॥
 
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मुदा हायनं लोक <ref>3</ref>कर्तारमाद्यं
 

लसत्केतुना बद्धहस्तैकपोतम् ।

सदोमालिनं देवलोकैकपूतं
 

सदानन्दरूपं गणेशं भजेऽहम् ॥ ६ ॥
 
</verse>
<verse>
जगत्कारणं तर्कवेदान्तवेद्यं
 

मुदा योगगम्यं विशुद्धाट्टहासम् ।

शरण्यं वरेण्यं विशुद्धं तमाद्यं
 

सदानन्दरूपं गणेशं भजेऽहम् ॥ ७ ॥
 
</verse>
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प्रियासिद्धिभाजे धिया वामभागे
 

लसन्माद्विकावामदेवं त्रिणेत्रम् ।
 

अमोघं सुरेशं महेशानमीशं
 

सदानन्दरूपं गणेशं भजेऽहम् ॥ ८ ॥
 
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॥ इति श्रीगणेशाष्टकं सम्पूर्णम् ॥
 
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<footnote>
1.
 
मे.
 
</footnote>
<footnote>
2. गौरि
 
</footnote>
<footnote>
3. स्रष्टार
 
</footnote>
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