Stotrarnava /49
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<ignore>श्रीगणपतिमन्त्राक्षरावलिः
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<verse>णपषष्ठवर्णवाच्यस्य दारिद्र्यस्य विभञ्जकैः ।
एतैरेकादशकरानलङ्कुर्वाणमुन्मदम् ॥ ११ ॥
</verse>
<verse>परानन्दमयं भक्तप्रत्यूहव्यूहनाशनम् ।
परमार्थप्रबोधाधिब्धिं पश्यामि गणनायकम् ॥ १२ ॥
</verse>
<verse>तत्पुरःप्रस्फुरद्विबिल्वमूलपीठ समाश्रयौ ।
रमारमेशौ विमृशाम्यशेषशुभदायकौ ॥ १३ ॥
</verse>
<verse>येन दक्षिणभागस्थन्यग्रोधतलमाश्रितम् ।
साकल्पं सायुधं वन्दे तं साम्बं परमेश्वरम् ॥ १४ ॥
</verse>
<verse>वरसम्भोगरुचिरौ'<ref>1</ref> पश्चिमे पिप्पलाश्रयौ ।
रमणीयतरौ वन्दे रतिपुष्पशिलीमुखौ ॥ १५ ॥
</verse>
<verse>रममाणौ गणेशानोत्तरदिक्फलिनीतले ।
भूभूधरावुदाराभौ भजे भुवनपालकौ ॥ १६ ॥
</verse>
<verse>वलमानवपुर्ज्योतिःकडारितककुप्तटीः ।
हृदयादिरगं देवि'<ref>2</ref>रङ्गरक्षाकृते भजे ॥ १७ ॥
</verse>
<verse>रदकाण्डरुचिज्योत्स्ना"<ref>3</ref>काशगण्डस्रवन्मदम् ।
ऋद्धध्याश्लेषकृतामोदमामोदं देवमाश्रये ॥ १८ ॥
</verse>
<verse>दलत्कपोलविगलन्मदधाराबलाहकम् ।
समृद्धिदतटिदाश्लिष्टं प्रमोददं हृदि भावये ॥ १९॥
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<verse>सकान्तिं कान्तिलतिका परिरब्धतनुं भजे ।
भुजप्रकाण्ड' <ref>4</ref>सच्छायं सुमुखं कल्पपादपम् ॥ २० ॥
</verse>
<verse>वन्दे तुन्दिल '<ref>5</ref>मिन्धानं चन्द्रकन्दलशीतलम् ।
दुर्मुखं मदनावत्या निर्मितालिङ्गनामृतम् ॥ २१ ॥
</verse>
<verse>जम्भवैरिकृताभ्यचर्च्यौ जगदभ्युदयप्रदौ ।
अहं मदद्रवौ विन्घ्नाहतये "<ref>6</ref>तेजसां श्रये ॥ २२ ॥
'</verse>
<verse><ref>7</ref>नवशृङ्गाररुचिरौ नमत्सर्व सुरासुरौ ।
द्राविणीविघ्नकर्तारौ द्रावयेतां दरिद्रताम् ॥ २३ ॥
</verse>
<footnote>1. रसिकौ
5.
सन्धां च
</footnote>
<footnote>2.
देवमङ्ग
6.
रेफसां
</footnote>
<footnote>3.
शार
7.
सम
</footnote>
<footnote>4.
संच्छायि
</footnote>
<footnote>5. सन्धां च</footnote>
<footnote>6. रेफसां</footnote>
<footnote>7. सम</footnote>
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<ignore>श्रीगणपतिमन्त्राक्षरावलिः
<verse>ण
एतैरेकादशकरानलङ्कुर्वाणमुन्मदम् ॥ ११ ॥
<verse>परानन्दमयं भक्तप्रत्यूहव्यूहनाशनम् ।
परमार्थप्रबोधा
<verse>तत्पुरःप्रस्फुरद्
रमारमेशौ विमृशाम्यशेषशुभदायकौ ॥ १३ ॥
<verse>येन दक्षिणभागस्थन्यग्रोधतलमाश्रितम् ।
साकल्पं सायुधं वन्दे तं साम्बं परमेश्वरम् ॥ १४ ॥
<verse>वरसम्भोगरुचिरौ
रमणीयतरौ वन्दे रतिपुष्पशिलीमुखौ ॥ १५ ॥
<verse>रममाणौ गणेशानोत्तरदिक्फलिनीतले ।
भूभूधरावुदाराभौ भजे भुवनपालकौ ॥ १६ ॥
<verse>वलमानवपुर्ज्योतिःकडारितककुप्तटीः ।
हृदयादिरगं देवि
<verse>रदकाण्डरुचिज्योत्स्ना
ऋद्
<verse>दलत्कपोलविगलन्मदधाराबलाहकम् ।
समृद्धि
<verse>सकान्तिं कान्तिलतिका
भुजप्रकाण्ड
<verse>वन्दे तुन्दिल
दुर्मुखं मदनावत्या निर्मितालिङ्गनामृतम् ॥ २१ ॥
<verse>जम्भवैरिकृताभ्य
अहं मदद्रवौ वि
'
<verse><ref>7</ref>नवशृङ्गाररुचिरौ नमत्सर्व
द्राविणीविघ्नकर्तारौ द्रावयेतां दरिद्रताम् ॥ २३ ॥
<footnote>1. रसिकौ
5.
सन्धां च
<footnote>2.
6.
रेफसां
<footnote>3.
7.
सम
<footnote>4.
<footnote>5. सन्धां च</footnote>
<footnote>6. रेफसां</footnote>
<footnote>7. सम</footnote>
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