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<title>२. ॥ श्रीगणपतिमन्त्राक्षरावलिः ॥</title>
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श्रीदेव्युवाच-
 
२. ॥ श्रीगणपतिमन्त्राक्षरावलिः ॥
 
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विना तपो विना ध्यानं विना होमं विना जपम् ।

अनायासेन विघ्नेशप्रीणनं वद मे प्रभो ॥ १ ॥
 
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महेश्वर उवाच -
 
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मन्त्राक्षरावलिस्तोत्रं महासौभाग्यवर्धनम् ।

दुर्लभं दुष्टमनसां सुलभं शुद्धचेतसाम् ॥ २ ॥
 
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महागणपतिप्रीतिप्रतिपादकमञ्जसा ।
 

कथयामि घनश्रोणि कर्णाभ्यामवतंसय ॥ ३ ॥
 
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ओंकारवलयाकारम् अच्छ कल्लोलमालिकम् ।

ऐक्षवं चेतसा वक्ष्ये सिन्धुं सन्धुक्षितस्वनम् ॥ ४ ॥
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श्रीमन्तं मध्यजलधेरन्तरभ्युदितं नुमः ।

मणिद्वीपं महाकायं महाकल्पं<ref>1</ref> महोदयम् ॥ ५ ॥
 
"
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<verse><ref>2</ref>
प्रीतिमादधता धाम्ना धाम्नामीशे <ref>3</ref>किशोरके ।

कल्पोद्यानस्थितं वन्दे भारवन्तं<ref>4</ref> मणिमण्डपम् ॥ ६ ॥
 
की
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<verse>क्लीब
स्यापि स्मरोन्मादकारिशृङ्गारशालिनि ।

तन्मध्ये गणनाथस्य मणिसिंहासनं भजे ॥ ७ ॥
 
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ग्लौकलाभिरिवाच्छाभिस्तीत्व्रादिनवशक्तिभिः ।

जुष्टं लिपिमयं पद्मं धर्माद्याश्रयमाश्रये ॥ ८ ॥
 
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गम्भीरमिव तत्राब्धिधिं वसन्तं त्र्यश्रमण्डले<ref>6</ref>

उत्सङ्गगतलक्ष्मीकमुद्यत्तिग्मांशुपाटलम् ॥ ९ ॥
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गदेक्षुकार्मुकरुजा चक्राम्बुजगुणोत्पलैः ।

व्रीह्यग्रनिजदन्ताय'<ref>6</ref> तुलसीमातुलुङ्गकैः ॥ १० ॥
 
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1.
 
कायं
 
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<footnote>
2. हेति
 
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<footnote>3. शिरोरके</footnote>
<footnote>
4. भास्वरं
 
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<footnote>
5.
 
मण्डपे
 
3. शिरोरके
 
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<footnote>
6. सलकी
 
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