Stotrarnava /159
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<ignore>श्रीताण्डवस्तोत्रम्
<verse>रणन्नूपुरद्वन्द्वहारि स्वकीयाङ्घ्रि-
पद्मद्वयाम्भोरुहापूर्णविश्वम् ।
नमन्मध्यसाचीकृतस्वाङ्घ्रिपद्मं
भजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ ५ ॥
<verse>शिवाशेषबन्धो कृपापूर्णसिन्धो
शिवानन्दसन्दोहसन्धानबन्धो ।
महाश्चर्यनृत्योल्लसत्पादपद्मं
भजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ ६ ॥
<verse>कटिप्रान्तसम्बन्धिसौवर्णसूत्रं
प्रलम्ब
महासिंहनादं प्रभिन्नाब्दजालं
भजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ ७ ॥
<verse>भ्रमद्
प्रभो क्षिप्तमार्ताण्डकोटि
महाहीशभूषं सुरेशं महेशं
भजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ ८ ॥
<verse>महानृत्यसंजात
महायोगिहृत्पद्मकोशावभासम् ।
महानागयज्ञोपवीतावभासं
भजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ ९ ॥
<verse>भवानीश भूतेश भर्गासुरारे
भवारे पुरारे सुरेशार्चिताङ्
न जानाति युष्मत्स्वरूपं जनोऽयं
भजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ १० ॥
<verse>मुकुन्दाब्जहस्तोल्लसत्<delete>त्रासनादं
नमद्देवबृन्दं सुहृद्योगिबृन्दम् ।
लसत्कुन्ददन्तं शिवानन्द
भजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ ११ ॥
<verse merge-next="true">जटाजूटगङ्गातरङ्गोर्मिच
त्सहस्रां<delete>शु</delete><add>[म्बु]</add>जाता
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