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श्रीताण्डवस्तोत्रम्
 
रणन्नूपुरद्वन्द्वहारि स्वकीयाङ्घ्रि-
पद्मद्वयाम्भोरुहापूर्णविश्वम् ।
नमन्मध्यसाचीकृतस्वाङ्घ्रिपद्मं
 
भजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ ५ ॥
 
शिवाशेषबन्धो कृपापूर्णसिन्धो
शिवानन्दसन्दोहसन्धानबन्धो ।
महाश्चर्यनृत्योल्लसत्पादपद्मं
 
भजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ ६ ॥
 
कटिप्रान्तसम्बन्धिसौवर्णसूत्रं
 
प्रलम्ब प्रकीर्णोरुघण्टा निनादम् ।
महासिंहनादं प्रभिन्नाब्दजालं
 
भजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ ७ ॥
 
भ्रमद्वाहुदण्डं गदा पूर्णरत्नं
 
प्रभो क्षिप्तमार्ताण्डकोटि प्रकाशम् ।
 
महाहीशभूषं सुरेशं महेशं
 
भजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ ८ ॥
 
महानृत्यसंजात भीमाट्टहासं
महायोगिहृत्पद्मकोशावभासम् ।
महानागयज्ञोपवीतावभासं
 
भजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ ९ ॥
 
भवानीश भूतेश भर्गासुरारे
 
भवारे पुरारे सुरेशार्चिताङ्घे ।
न जानाति युष्मत्स्वरूपं जनोऽयं
 
भजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ १० ॥
 
मुकुन्दाब्जहस्तोल्लसत्त्रासनादं [ द्वेत्रनादैः ]
नमद्देवबृन्दं सुहृद्योगिबृन्दम् ।
लसत्कुन्ददन्तं शिवानन्द कन्दं
 
भजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ ११ ॥
 
जटाजूटगङ्गातरङ्गोर्मिचश्च-
 
त्सहस्रांशु[म्बु]जाताघृताकाशमीशम् ।
 
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