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११२
 
1.
 
श्रीशिवस्तोत्रेषु
 
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दिगम्बरोल्लसद्वपुर्धरं धरारथान्वितं
 

हृदम्बुजे जगद्गुरूं चिदम्बरं विभावये ॥ ८॥
 
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सदन्तरङ्गसज्जनौघपापसङ्घनाशने
 

मदान्धयुक्तदुर्जनालिशिक्षणे विचक्षणः ।

चिदम्बराख्यसद्गुरुस्वरूपमेत्य भूतले
 

सदाशिवो विराजते सदा मुदान्वितो हरः ॥ ९ ॥
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चिदम्बराख्यसद्गुरोरिदं सदा विलासिनं
 

नुदा लिखन्ति ये सकृत् सदोपमानमष्टकम् ।

सदा वशे[ से ] तदा त्तदालये हरिप्रिया तदानने

विधिप्रिया च निश्चला जगद्गुरोरनुग्रहात् ॥ १० ॥
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॥ इति श्रीचिदम्बरपञ्चचामरस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
 
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<footnote>
३८. ॥ अथ श्रीताण्डवस्तोत्रम् ॥
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नमस्कृत्य रामं महादेवदेवं
 

भवानीकटाक्षेक्षणानन्दजालम् ।

तदालोकलोलं महानृत्यलीलं
भजे
पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ १ ॥

<note>भजे misaligned in source text</note></verse>
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भवान्तं भजे तं हृदन्ते महान्तं

भवाधिब्धिं तरन्तेन्दुकुन्दावभासम्

<add>
[भवाब्धेस्तरन्तीं</add><ref>1</ref><add> दुकूलावभासम् ]</add>

तमीशं रमेशार्चिताङ्घ्रि <add>[द्वयाब्जं ]
 
1
 
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भजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ २ ॥
 
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जटाजूटसोमं ललाटाक्षभीमं
 

नटाचार्यवामं सदा पूर्णकामम् ।

सदावामभामं हृदानन्दरामं
 

भजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ ३ ॥
 
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धराश्रीशवागीशनागेशमुख्यैः

सुरैः सेवितं तालवीणादिहस्तैः ।

पदाघातसङ्घातसघृष्टदैत्यं
 

भजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ ४ ॥
 
</verse>
<footnote>1.
तरन्ती = नौका ।
 
</footnote>
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