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१०४
 
श्रीशिवस्तोत्रेषु
 
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वित्ताधीशसखं विशालनिटिलं सत्तामयं शाश्वतं

चित्तादत्म्यदिव्यनामविभवं चित्ताधिजाताहितम् ।

मत्ताने कपगामिनं प्रणवसंवित्तास्वरूपं भवं

मत्ताहीनसुबोधगोचरमलं मत्तापापहाङ्घ्रिरिं भजे ॥ ८ ॥
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अष्टप्रासाष्टकं शम्भोरिष्टं भक्त्या पठन्ति ये ।

इष्टा भवन्ति श्रीगन्ध पुष्टिकाननवासिनः ॥ ९
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॥ इति श्रीअष्टप्रासाष्टकं सम्पूर्णम् ॥
 
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३१. ॥ अथ श्रीत्यागराजाष्टकम् ॥
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चन्द्रार्धचूडाय सदाशिवाय साम्बाय लक्ष्मीपति सेविताय ।

भक्तानुर<delete>क्षा</delete><add>[क्ता ]</add>य महेश्वराय त्यागाधिराजाय नमः शिवाय ॥ १ ॥
 
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सुमेरुचापाय सुशोभनाय ब्रह्मेन्द्रनारायणवन्दिताय ।
 

वाचामतीताय मनोन्मनाय त्यागाधिराजाय नमः शिवाय ॥ २॥
 
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देवादिदेवाय जगत्त्रयाय जन्मादिहीनाय निरञ्जनाय ।
 

राजाधिराजाय सुरेश्वराय त्यागाधिराजाय नमः शिवाय ॥ ३ ॥
 
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वेदान्तवेद्याय विभूषणाय विराजमानाय सुरस्मिताय ।
 

शुद्धान्तसूक्ष्माय सुरार्चिताय त्यगाधिराजाय नमः शिवाय ॥ ४ ॥
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रत्नादिभूषाय जटाधराय कल्पान्तहीनाय कलाधराय ।

कालान्तकायाखिलनायकाय त्यगाधिराजाय नमः शिवाय ॥ ५ ॥
 
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पञ्चाननाय फणिराजविभूषणाय
 

स्वर्गापवर्ग फलदाय विमोक्षदाय ।
 

मीमांसकादिभुवनत्रयपालकाय
 

त्यागाधिराजरसिकाय नमः शिवाय ॥ ६ ॥
 
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मुक्ताय लोकस्य परात्पराय पञ्चाक्षरी<delete>पाठक</delete><add>[जापक] </add>मोक्षदाय । 1

त्रेताधिरूपाय जगज्जनित्रे त्यागाधिराजाय नमः शिवाय ॥ ७ ॥
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सिंहासनस्थाय दिगम्बराय शीतांशुवर्णाय जटाधराय ।
 

श्रीपार्वतीशाय सदाशिवाय त्यागाधिराजाय नमः शिवाय ॥ ८ ॥
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नमः शिवायेति सकृज्<delete>जपित्वा </delete><add>[ जपेन ]</add> पापं महद्वोघोरमुपैति नाशम् ।

भूम्यन्तरिक्षात्परिपूर्णकाष्ठं स्वल्पाग्निना दग्धमुपैति नाशम् ॥ ९ ॥
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॥ इति श्रीत्यागराजाष्टकं सम्पूर्णम् ॥
 
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