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श्रीषडर्णमन्त्राष्टकम्
 
९१</ignore>
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यदा त्वत्कृपापात्रजन्तुस्वचित्ते

महादेव वीरेश मां रक्ष रक्ष ।

विपक्षानमून भक्ष भक्षेति यो वै
 

वदेत्तस्य मित्रं भजे वीरभद्रम् ॥ १२ ॥ ·
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अनन्तश्च शङ्खस्तथा कम्बलोऽसौ
 

वमत्कालकूटश्च कर्कोटकाहिः ।
 

तथा तक्षकञ्चारिसङ्घान्निहन्या-
 

दिति प्रार्थ्यमानं भजे वीरभद्रम् ॥ १३ ॥
 
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गलासक्तरुद्राक्षमालाविराज-
 

द्विभूतित्रिपुण्ड्राङ्क फालप्रदेशः ।
 

सदा शैवपञ्चाक्षरीमन्त्रजापी
 

भवे भक्तवर्यः स्मरन् सिद्धिमेति ॥ १४ ॥
 
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<verse>
भुजङ्गप्रयातैर्महारुद्रमीशं
 

सदा तोषयेद्यो महेशं सुरेशम् ।
 

स <add>
[ भूत्वा ]</add> धरायां समग्रं च भुक्त्वा
 

विपद्भ्यो विमुक्तः सुखी स्यात्सुरः स्यात् ॥ १५ ॥
 
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॥ इति श्रीवीरभद्रभुजङ्गप्रयातस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
 
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<footnote text="23_START">
२३. ॥ अथ श्रीषड्डूर्णमन्त्राष्टकम् ॥
 
</footnote>
<verse>
धनुर्धरित्रीधरसार्वभौमः
 

मौर्वी च दर्वीकर सार्वभौमः ।
 

शरस्तु सर्वामरसार्वभौमः
 

पायात्स नो दैवत सार्वभौमः ॥ १ ॥
 
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वेदान्ततत्त्वमथितं नवनीतसारं
 

चिद्रपदृक्परमशैव रहस्यमन्त्रम् ।
 

ज्योतिर्मयोज्ज्वलनिरञ्जनरूपमन्त्रं
 

वन्दे षडक्षरसदाशिवनाममन्त्रम् ॥ २ ॥
 
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<verse>
अश्रान्तदुष्कृतिसमुद्रतरीशमन्त्रं
 

पापाम्बुराशिबडबानलतुल्यमन्त्रम् ।
 

ब्रह्माच्युतेन्द्रसुरमौनिजपैकमन्त्रं
 

वन्दे षडक्षरसदाशिवनाममन्त्रम् ॥ ३ ॥
 
९१
 
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