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८६
 
श्रीशिवस्तोत्रेषु
 
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जटामण्डले नानटद्दिव्यगङ्गा-

झरीतुङ्गवीचिच्छटा दीप्यमानम् ।

पटीभूतकृत्तिं <ref>1</ref>नटालीवरेण्यं
 

भजे शङ्करं वालिशैलाधिनाथम् ॥ २ ॥
 
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दलत्कुन्दमन्दारकर्पूरगौरं

गलद्भस्मरेखाविजृम्भल्ललाटम् ।

बलारिस्तुतं बालवालेन्दुमौलि
 
लिं
भजे शङ्करं वालिशैलाथिनाथम् ॥ ३ ॥
 
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<trailer text="18END">
॥ इति श्रीवालिशैलाधिनाथत्रयं सम्पूर्णम् ॥
 
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<title text="19_START">
१९. ॥ अथ श्री वीरभद्राष्टकम् ॥
 
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दक्षाध्वरध्वंसविधानदक्षं
 

दम्भोलितुल्यायतबाहुवृबृन्दम् ।
 

फालोज्ज्वलन्नेत्रहुताशनेन
 

भस्मीकृतारिं भज वीरभद्रम् ॥ १ ॥
 
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कङ्कालदण्डं कठिनोग्रदंष्ट्रं
 

कपालमाë<delete>लं</delete><add>[ला]</add>कमनीयहारम् ।
 

कन्दर्पदर्पापहसर्पहारं
 

भस्माङ्गलेपं भज वीरभद्रम् ॥ २ ॥
 
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भूतेशमीशं भुजगाभिरामं
 

भस्मीकृताशेषपुरप्रतापम् ।
 

उन्निद्रपद्मायतनेत्रपद्मं
 

श्री वीरभद्रं भज वीरभद्रम् ॥ ३ ॥
 
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<verse>
कालाञ्जनश्यामलकोमलाङ्गं
 

कण्ठान्तरस्थापितकालकूटम् ।
 

भागीरथी चुम्बितमौलिभागं
 

फालाग्निनेत्रं भज वीरभद्रम् ॥ ४ ॥
 
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<footnote>
1.
 
कृत्यं
 
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