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'सभाष्यशुक्लयजुर्वेद परिशिष्टेषु -
 
मन्त्रप्र०
 
तं ते॑ देव सवितर्य॒ज्ञं
रुद्रव॒तेन॑
ए॒तस॑वस्य॒ परि॑ ते
 
ए॒ता अ॑ष॑न्ति॒ हृद्या॑त्समु॒द्रात् १७
 
अ० कं०
 
मन्त्रप्र०
 
अ० कं०
 

 
१२ । क॒दाच॒न स्त॒रीर॑सि॒ नेन्द्र॑
 
८ २
 
मन्त्रप्र०
 
कौऽसि कत॒मोऽसि॒ कस्या॑सि॒
 
अ०
 
°
 

 
२९
 
३ ६१
 
१८
 
५९
 
कन्या इव वह॒तुमेत॒वा उ॑
कर्या नश्चि॒त्र आर्भुवदूती
 
१७
 
२७
 
९७ कौऽसि कत॒मोऽसि॒ कस्मै॑ २०
३९ । कः स्विदेकाकी चरति
 

 
२३
 
४५
 
९३
 
कर्या नश्चित्र आर्भुव
 
३६
 
४ कः स्विदेकाकी च॑रति
 
२३ ९
 
एता
 
वः सु॒भगा॑ वि॒श्व
 
२९
 

 
क्य॒ त्वं न॑ उ॒त्याभिप्र
 
३६
 
७ क्रम॑ध्वम॒ग्निना॒ा नाक॒
 
१७
 
६५
 
एत ऐन्द्रामा द्विरूपा
 
२४
 

 
कल्प॑न्तां ते दिश॒स्तुभ्य॒
 
३५
 

 
क्र॒व्याद॑म॒ग्मिं प्रहि॑णोमि
 
३५ १९
 
ए॒ताव॑द्रूपं य॒ज्ञस्य॒
 
१९
 
३१ क॒व॒ष्यो॒ न व्यच॑स्वतीर्
 
२०
 
६०
 
क्ष॒त्रस्य॑ त्वा पु॒रस्ता॑य॒
 
३८ १९
 
ए॒तावा॑नस्य महि॒मा
 
३१
 

 
स्त्वा॑ यु॒नक्ति॒ स
 

 

 
ए॒दम॑गन्म देव॒यज॑नं
 
४ १
 
कस्त्वाऽऽच्छ्य॑ति॒ कस्त्वा
 
क्षत्रस्य॒ योनि॑रसि त्र
 
२०
 

 
२३
 
ए॒स्येधिष॒महि॑ स॒मिद॑सि॒ २०
 
२३
 
कस्त्वा॑ स॒त्यो मदा॑नां॒
 
३९ । क्ष॒त्रस्योल्न॑मसि क्ष॒त्रस्य॑
 
१०
 
V
 
२७
 
धा॒स्येधिष॒महि॑ स॒मि ३८
ए॒ना विश्वा॑न्य॒र्य आ
ए॒ना वो॑ अ॒ग्निं नम॑सि॒
भिर्नो अ॒र्कैर्भवनो
ए॒व॒श्छन्द॒ वरि॑व॒श्छन्द॑ः
 
२५
 
कस्त्वा॑ स॒त्यो मदा॑न॒
 
४० अ॒न्त्रेणा॑ग्ने॒ स्वायु॒ः सभू॑
 
२७ ५
 
३६
 

 
अ॒पो रा॑जन्नु॒त मनाने॒
 
१५
 
३७
 
२६
 
१८
 
कस्त्वा॒ विमु॑ञ्चति॒ स त्वा
 

 
२३
 
१५ ३२
 
का ईमरे पिशंगला का
 
२३
 
५५
 
ख.
 
१५ ४६
 
काण्डत्काण्डात्य॒रोह॑न्ती
 
१३
 
२०
 
खगो वैश्वदे॒वः श्व
 
कृष्णः
 
२४
 
४०
 
१५
 

 
का व सि॒ि मन॑सा
 
२३
 
ए॒वेदिन्द्र॒ वृष॑ण॒ वज्र॑बाहुं
 
२०
 
५४ । कान्य॑योरा॒जने॑षु॒ क्रत्वा
 
ग.
 
३३ ७२
 
ए॒ष छाः पु॒रो अश्वे॑न
 
२५
 
२६ काम कामदुधे धुव
 
१२ ७२
 
ग॒णानां॑ त्वा ग॒णप॑तिœ
 
२३
 
१९
 
ए॒ष ते॑ गाय॒त्रो भाग इर्त
 

 
२४ काय स्वाहा कस्मै स्वाहा
 
२२
 
२० ग॒न्ध॒र्व॑स्त्वा॑ वि॒श्वाव॑सुः
 

 
om
 

 
एष ते निर्ऋते भागस्तं
 
एष
 
तै रुद्र भागः
 
एष वः स्तोमो मरुत
 
ए॒षस्य वाजी क्षि॑िप॒णं
 

 
३४ ४८
 
om
 
३५
 
कार्षिरसि
 
५७
 
समुद्रस्य
 
का स्विदासीत्पूर्वचित्तिः
 
त्वा
 

 
२८
 
गर्भो अ॒स्योष॑धीनां॒ गर्भो
 
१२
 
३७
 
२३
 
११
 
गर्भो दे॒वानां॑ पि॒ता म॑
 
३७
 
१४
 
का स्विदासीत्पूर्वचित्तिः
 
२३
 
५३ गाय॒ छन्द॑सि॒ त्रैष्टु॑भ
 
૨૮
 
९ १४
 
किस्विदासीदधि॒ष्ठान॑
 
१७
 
१८ । य॒त्री त्रि॒ष्टुब्जग॑त्यनु॒
 
२३ ३३
 
ए॒षा ते॑ अग्ने स॒मित्ता
 

 
१४
 
किस्विनं क उ स
 
१७
 
२० । गाय॒त्रेण॑ त्वा॒ छन्द॑सा॒
 
१ २७
 
एषा
 
तै
 
शुक्र तनूः
 

 
१७
 
स्व॒त्सूर्य॑म॒ ज्योति॒ः २३
 
४७ गाव॒ उपा॑वताव॒तं म॒ही
 
३३ १९
 
एष वः सा सत्या संवा
 
एषो हे देवः प्रदिशो नु
 

 
१२ । कुक्कुटोसि॒ मधु॑जिह्न
 

 
१६ गाव॒ उपा॑वताव॒तं मही
 
३३
 
७१
 
३२
 

 
कुत॒स्त्वमि॑न्द्र॒ माहिनः
 
३३
 
२७ । गृहा मा बिभीत॒ मा
 

 
४१
 
षु वा॑णि॒
 
२६
 
१३
 
कुम्भो व॑नि॒ष्टुजैनि॒ता
 
१९
 
८७ गोत्रभिदं गोविदुं वज्र॑बाहुं
 
१७
 
ऐ.
 
कुर्वन्ने॒वेह॒ कर्म॑णि जि
 
४०
 
२ गोभिर्न सोममश्विना
 
२०
 
पेन्द्र प्राणो अने अने
 
ओजश्च मे सहश्च म
ओमासश्चर्षणीष्टतो
 
ओष॑धयः॒ प्रति॑गृभ्णीत॒ ११
 
कुलायिनी॑ घृ॒तव॑ति॒
 
१४
 
२ गोम॑नु॒षणा॑स॒त्यश्वा॑
 
२०
 
८१
 

 
२०
 
ओ.
 
कु॒विद॒ङ्ग यव॑मन्त॒ यत्र॑
 
१९
 
६ ग्रह ऊर्जाहुतयो व्यन्तो
 

 
कु॒विद॒ङ्ग यव॑मन्त॒यव॑
 
१०
 
३२ ग्रीष्मेण॑ ऋ॒तुना॑ दे॒वा
 
२१
 
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३८
 
६६
 

 
२४
 
.
 

 
कु॒विद॒ङ्ग यव॑मन्त॒ यत्र॑
 
२३
 
३८
 

 
३३
 
कृ॒णुष्व पाज॒ः प्रसि॑ति॒ न
 
ET.
 
१३
 

 
४८
 
कृष्णग्रीवा आग्ने॒याः
 
२४
 

 
घम॒तत्ते॒ पुरी॑षं॒ तेन॒
 
३८
 
२१
 
ओष॑धय॒ः सम॑वदन्त॒
 
१२ ९६
 
कृ॒ष्णग्रचा आने॒या ब॒भ्र
 
२४
 
१४ घृतं घृतपावनः पिबत
 

 
१९
 
ओषधीः प्रति॑मोदध्वं
 
१२
 
७७
 
ओष॑ध॒ीरिति॑ मातर॒ः
 
कृ॒ष्णमी॑वा आग्ने॒या
 
क.
 
ककु॒भरू॒प॑ वृ॑ष॒भस्य॑
 
कत्य॑स्य वि॒ष्टाः कल्य॒क्षरो
क॒दाच॒न प्रयु॑च्छस्य॒भे
 
क्रुदाच॒न स्त॒रीर॑
 
१२ ७८ कृष्णा भौमा आ
 
धूम्रा
 
८ ४९ । के॒तुं कृ॒ण्वन्न॑के॒तवे॒ पेशो॑
 
२३
 
५७ । केष्व॒न्तः पुरु॑ष॒ आवि॑वेश
को अ॒स्य वे॑द॒ भुव॑नस्य
३ ३४ । कोऽद्वात्कस्म अद्वात्कामो
 
८ ३
 
९ घृ॒तं मि॑मिक्षे घृ॒तम॑स्य॒
२४ १० घृ॒तव॑ति॒ भुव॑नानामभ
 
२४
 
१७ ८८
 
३४
 
४५
 

 
१ घृ॒ताची स्थो धुर्यो पात
 
२ १९
 
२९
 
३७ घृ॒ताय॑सि जुर्नाम्ना॒ा
 
२ ६
 
२३
 
५१ घृतेन सीता मधु॑ना सम॑
 
१२ ७०
 
२३
 
५९ घृतेनाक्तौ पशुस्वा॑येथा॑
 

 
११
 

 
४८ । घतेना अन्सं पुथो दे॑व॒
 
२९