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सभाप्यशुक्लयजुर्वेदपरिशिष्टेषु -
 
मन्त्रप्र०
 
मन्त्रप्र०
 
अदित्यास्त्वा पृष्ठे साद
अदि॑त्या॒स्त्वा मू॒र्धनार्जघा
अदि॑त्यै॒ रास्ना॑सि॒ विष्ण
 
अदि॑त्यै॒ रास्ना॑सीन्द्रा॒ण्या
 
अ० कं०
 
अ० कं०
 
मन्त्रप्र०
 
अ० कं०
 
१४ ५
 
अन्विद॑नु॒मते॒ त्वं मन्य ३४
 

 
अ॒यं ते॒ योनि॑र्ऋत्वियो
 
१५ ५६
 

 
२२
 
अप॑श्यं गोपामनि॑पद्यमान् ३७
 
१७
 
अ॒यं द॑क्षि॑णा वि॒श्वक॑र्मा॒
 
१३ ५५
 

 
३०
 
अ॒पां गम्भ॑न्सीद॒ मा त्वा
 
१३
 
३०
 
अ॒यं द॑क्षि॒णा वि॒श्वक॑र्मा॒
 
१५ १६
 
३८
 
३ । अपा॒घमप॒किल्बिषम्
 
३५
 
११
 
अ॒यं नो॑ अ॒ग्निर्वरिव
 
५ ३७
 
अदि॑त्यै॒ रास्ना॒स्यदि॑ति
 
११
 
५९ । अपा॑तम॒श्विना॑ घ॒र्म
 
३८
 
१३
 
अ॒यं नो॑ अ॒ग्निर्वरि॑वस्कृणोतु
 
७ ४४
 
अदि॑त्यै॒ व्यु॑द॑नमसि
 

 
२ अ॒पां त्वेम॑ साधयाम्य॒पां
 
१३
 

 
अ॒य॑ प॒श्चाद्वि॒श्वव्य॑चा
 
१३ ५६
 
अश्रमस्य केतवो विर्
 
४० । अपा॑धमद॒भिश॑स्तीर
 
३३
 
९५
 
अ॒य॑ प॒श्चाद्वि॒श्वव्य॑चा
 
१५ १७
 
अ॒न्यः क्षीरं व्य॑पिव॒त्
 
१९
 
७३ अ॒पां पृ॒ष्ठम॑सि॒ योनि॑र॒ग्नेः
 
११
 
२९
 
अ॒यं पुरो भुव॒स्तस्य॑
 
१३ ५४
 
अ॒द्भ्यः संभृ॑तः पृथि॒व्यै
 
३१
 
१७
 
अ॒पा॑ पृ॒ष्ठम॑सि॒ योनि॑
 
१३
 
५३
 
अ॒यं पु॒रो हरिकेश॒ः सूर्य
 
१५ १५
 
अ॒द्भ्यः स्वाहा॑ वा॒र्ग्यः
 
२२
 
२५
 
अ॒पां पे॒रुर॒स्यापो॑ दे॒वीः
 

 
१०
 
अ॒यम॒ग्निगृ॒हप॑ति॒र्गार्ह
 

 
३९
 
अ॒द्या दे॑वा॒ उदि॑ति॒ सूर्य॑स्य॒
 
३३
 
४२
 
अ॒पां फेने॑न॒ नमु॑चेः
 
१९
 
७१
 
अ॒यम॒ग्निः पुरीष्यो
 

 
४०
 
अधा॒ यथा॑ नः पि॒तरः परो १९
 
६९
 
अ॒पामि॒दं न्यय॑नं समुद्रस्य॑
 
१७
 

 
अ॒यम॒ग्निर्वी॒रत॑मो वयोधाः १५ ५२
 
अधा॒ ह्य॑ग्ने॒ क्रतो॑भ॒द्रस्य॒
 
१५
 
४५
 
अ॒पा पृथि॒व्यै देव
 
9
 
२६
 
अ॒यम॒ग्निः स॑ह॒स्रिणो
 
१५ २१
 
अनि इन्द्रै विष्णो सजा ३३
 
अधिपत्यसि बृह॒ती
 
अध्य॑वोचदधिव॒क्ता
 
अध्व॑यो॒ अवि॑भिः स॒त♛ २०
 
अ॒न॒ड्वान्वय॑ः प॒ङ्किश्छन्दो
 
अ॒न॒वाह॑म॒न्वार॑भामहे
 
I
 
४७ । अ॒पारस॒मुद्व॑यसा॒ सूर्य
 
९ ३
 
अ॒यमि॒ह प्र॑थ॒मोऽधा॑यि
 
३ १५
 
१५
 
१४
 
अपि॒ तेषु॑ त्रि॒षु प॒देष्व॑
 
२३
 
५०
 
अ॒यमि॒ह प्र॑थम॒ोऽधा॑य
 
१५ २६
 
१६
 

 
अप॑त॒ वीत॒ वि च॑ सप॒ता
 
१२
 
४५
 
अ॒यमि॒ह प्र॑थ॒मोऽध/यि
 
३३
 

 
३१
 
अपे॒तो य॑न्तु प॒णयोसु॑न्न
 
३५
 

 
अ॒यमु॑त्त॒रात्सं॒यव॑सु॒स्तस्य॒
 
१५ १८
 
१४
 
१० । अ॒पो दे॒वी मधु॑मती
 
१०
 

 
अ॒यम॒पर्य॒र्वाग्व॑सु॒स्तस्य॑
 
१५ १९
 
३५
 
१३ अ॒वो दे॒वीरूप॑ सृज॒ मधु॑
 
११
 
३८
 
अ॒यं वां मित्रावरुणा
 
७ ९
 
अनष्टष्टा पु॒रस्ता॑त्
 
३७
 
१३ अम॑स्वतीमश्विना वाच
 
३४
 
२९
 
अ॒यं वे॒नश्चा॑दय॒त्पृभि॑गर्भा
 
७ ६६
 
अ॒न॒धृप्यो जा॒तवे॑द॒
 
अनु॑ ते॒ शुष्म॑ तु॒रय॑न्तमी
 
अनु॑त्त॒मा ते॑ मघव॒न्न क्रि॒िर्नु
 
२७
 

 
अप्स्व॒ग्ने॒ सध॒ष्टव॒ सौष॑धी
 
१२
 
३६ अ॒यस॒हस्र॒मृर्षभिः
 
३३
 
८३
 
३३
 
७ अ॒प्स्व॒न्तर॒मृत॑म॒प्सु भैषजं
 

 

 
अयसो अझिर्यस्मिन्
 
१२ ४७
 
३३
 
७९ । अवो॑ध्य॒ग्निः स॒मिधा
 
१५
 
२४
 
अनु॑ त्वा मा॒ता मि॑न्यत
 

 
२०
 
अ॒भि गोत्राणि॒ सह॑सा॒ा गाई १७
 
३९
 
अ॒र्धेत॑ स्थ राष्ट्र्दा राष्ट्रं
अर्धऽचैरु॒क्थान
 
१० ३
 
१९
 
२५
 
अनु॑ त्वा॒ रथो॒ अनु॒
 
मर्यो
 
२९
 
१५
 
अ॒भि त्य॑ दे॒वस॑वि॒तार॑
 

 
२५ अ॒र्व॒मासाः पर्रूषि
 
२३ ४१
 
अनु॑न॒ोद्यानु॑मतिर्य॒ज्ञं
 
३४
 

 
अ॒भि त्वां शूरनोन॒मो
 
२७
 
३५ . अमे॑भ्यो हस्ति॒प॑ ज॒वाया॑
 
३० ११
 
अनु॑ वी॒रैरनु॑ पु॒ष्यास्म
 
२६
 
१९
 
अ॒भि॒धा अ॑सि॒ भुव॑नम
 
२२
 

 
अर्य॒मण॑ बृह॒स्पति॒मिन्द्रो॒
 

 
२७
 
अने॑ज॒देकं॒ मन॑सो॒ जवी॑यः ४०
 

 
अ॒भि प्र॑वन्त॒ सम॑व॒ यो
 
१७
 
९६
 
अ॒र्वाञ्चा॑ अ॒द्या भ॑वता यज ३६
 
५१
 
अ॒न्तर॑ग्ने रु॒चा त्वमु॒खा
 
१२
 
१६
 
अ॒भि॒भूर॑स्ये॒तास्ते॒ पञ्च
 
१० २८
 
1
 
अ॒व॒तत्य॒ धनु॒सह॑
 
१६
 
१३
 
अ॒न्त॒रा मि॒त्रावरु॑णा॒
 
२९
 

 
अ॒भि य॒ज्ञं गृणीहि नः
 
२६
 
२१ अ॒व॒पत॑न्तीरवदन्द्रव
 
१२
 
९१
 
अ॒न्तश्च॑रति रोच॒नास्य
 

 

 
अ॒भीमं म॑हि॒मा दिवं
 
३८
 
१७
 
अवभृथ निचुम्पुण
 
८ २७
 
अ॒न्तस्ते॒ द्यावा॑पृथि॒वी
 

 

 
अभी पुणः सखीनां
 
२७ ४१
 
अवभृथ निचुम्पुण
 
३ ४८
 
अ॒न्धं तमः प्रविशन्ति
 
४०
 
९ । अ॒भी पुण॒ः सखीनां
 
३६
 

 
अव॑ रु॒द्रम॑दीम॒यव॑
 

 
५८
 
अ॒न्धं तम॒ः प्रवि॑शन्ति॒ि
 
४०
 
१२ अ॒भ्य॒र्पत सुष्टुतिं गव्य॑मा॒ाजि
 
१७
 
९८
 
अव॑सृष्टा॒ परा॑त॒ शर॑व्य॒
 
१७ ४५
 
अन्ध स्थान्धो वोर्भक्षीय
 

 
२०
 
अ॒भ्याद॑धामि स॒मध॒मन्ने॑ २०
 
२४
 
अवि॒र्न मेषोनसि
 
१९
 
९०
 
अन्न॑य॒तेन॑ नो ह्य
 
११
 
८३
 
अ॒भ्याव॑र्तस्व पृथि॒वी
 
१२ १०३
 
अष्टा दन्दशूकाः प्राची
 
१० १०
 
अन्ना॑त्परि॒स्रुतो॒ रसं॒
 
१९
 
७५
 
अनि॑रसि॒ नर्य॑सि॒ त्वया॑
 
११
 
१०
 
अवो॑चाम क॒वय॒ मेध्या॑य
 
9'3
 
२५
 
अ॒न्यदे॒वाहु॑वि॒द्याया॑
 
४०
 
१३
 
अ॒मषा॑ चि॒त्तं प्रतिलोभ
 
१७
 
४४
 
अ॒॑श॒ना॑ ते अ॒र्ध॒शुः
 
२० २७
 
अ॒न्यदे॒वाहुः स॑भ॒वान् ४०
अ॒न्य॒वापोऽर्धमासाना २४
अ॒न्या वो॑ अ॒न्याम॑स्व॒न्या १२
अन्व॒ग्निरु॒षसा॒मप्र॑मण्यत् ११
 
३७ अ॒मव॑ नः स॒हवा॒ आ
८८ अ॒य॑ ते॒ योनि॑र्च॒खियो॒
१७ । अ॒यं ते॒ योनि॑रृध्वियो
 
१०
 
अ॒मुत्र॒ भूया॒दधि॒ यद्य
 
२७
 

 
अ॒शुर॑श॒ष्टे देव
 

 

 
२६
 
२४
 
अ॒शुश्च॑ मे र॒श्मिश्व मे
 
१८ १९
 
३ १४
 
अश्म॒नूशं॒ पर्व॑ते शिनि
 
१७
 

 
१२
 
५२
 
अश्म॑न्वतीरीयते॒ स
 
३५
 
१०