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श्रीलक्ष्मी गम्
३२
।राभङ्गुर संसारघर्मसन्तप्तमनुजसन्तापनाशिनि ॥ ४ ॥ बहुलकुन्तलवदनमण्डल
पछवरुचिरलोचनसुभगकन्धराबाहुबलिका जप न नितम्बमण्डलम्य वित्तत्तशैवालस फुट
कुलकयुकमलिनीनालो चुङ्गविपुलपुलिमशोमिनि ॥ ५ ॥
माधवमहार्णव
नि ॥ ६ ॥ महिताय महावाहिनि ॥ ७ ॥ मुखचन्द्रसमुचतमालताल विराज
केचिदुदधितसूक्ष्मामकस्तूरीतिक कशूलसमुद्रत भीतिविशीर्ण समुज्झितसम्मुख भाग
युगलसरभसमिर तिमिरनिकरसन्देहसन्दा सिसीमन्तकुलान्ते ॥ ८ ।
कमणिमयकन्दर्पदर्पणसन्देहस दोहि सकलजनसम्मोहिफल फलविमललावप्यललित
मुदितमुदितमुखमण्डले ॥ ९ ॥ गहितप्रदिममहिममन्दहासासहिष्णुतदुदयस
तमोदीर्णारुणवर्णविश्रमदविडम्बितपरिणतबिम्बविदुमविलसदोष्ठयुगले ॥ १० ॥
सितदरहसितकोकनदकुन्दरदमन्धरत रोद्वत्वरविसत्वर कान्तिवीचिकमनीया मन्द
इासदनवदने ॥ ११ ॥ समुज्ज्वलतर मणितर्जिततरणिताट इनिट कन्दलितका
करम्बित कर्णशष्कुलीये ॥ १२ ॥ वहिरुपगतस्फुरणाचिगतान्तरण भूषणग
इनकोशसदस्फटिकमणिमयमितिशङ्काङ्कुरण गणपति फलितकर्णपूरकर्णावतंसताटक
लमण्डननिगनिगायमानविमल कपोलमण्डले ॥ १३ ॥ निजभुकुटी भटी भूतम्य
निटलफल
क्षद्वादशाक्षसह साक्षमभूतिसर्वसु पर्वशोभनम्रमण्डले ॥ १४ ॥
तिलकच्छविलो फकलोकविलोचन दो पचिर चितविद समवदनविधु मण्डविगलि
कापालिकानिगूढनि तनासाम स्थूलमुक्ताफलच्छ मव्यक्तदन विकनि लीन
नातिकान्तः प्रवृतश्री वामध्यो चभागकृत विभागश्रीयाग संविनिस्सृतपृधुरूलिस
जलयुगल निरक्षरी भूतगम्भीरनामिहूदा व गाढविली नदी तर पृधुसुधाधारा
युगकविमाधारविस्पष्टवक्ष्यमाणविशुद्धस्थूलमुकापसमाकायियोतितदिगन्तरे
"
सकलाभरणकला बिलासकृत जाग चिरस्थाविसौदामनीशाहुरे ॥ १६
करशनाकडिणी फलनादिनि ॥ १७ ॥ निजजनता गुणमिन प्रति निकट निवेदि
८ ॥ निखिलजनामोदिनि ॥ १९ ॥ निजपतिसम्मोदिनि ॥ २० ॥ मन्थ
हि ॥ २१ ॥ मन्दमिममवेहि ॥ २२ ॥ मयि मन आहि ॥ २३
शुभमवधेहि ॥ २४ ॥ मङ्गलमयि माहि ॥ २५ ॥ अकुण्ठवैकुण्ठमहाविभूति
३२
।राभङ्गुर संसारघर्मसन्तप्तमनुजसन्तापनाशिनि ॥ ४ ॥ बहुलकुन्तलवदनमण्डल
पछवरुचिरलोचनसुभगकन्धराबाहुबलिका जप न नितम्बमण्डलम्य वित्तत्तशैवालस फुट
कुलकयुकमलिनीनालो चुङ्गविपुलपुलिमशोमिनि ॥ ५ ॥
माधवमहार्णव
नि ॥ ६ ॥ महिताय महावाहिनि ॥ ७ ॥ मुखचन्द्रसमुचतमालताल विराज
केचिदुदधितसूक्ष्मामकस्तूरीतिक कशूलसमुद्रत भीतिविशीर्ण समुज्झितसम्मुख भाग
युगलसरभसमिर तिमिरनिकरसन्देहसन्दा सिसीमन्तकुलान्ते ॥ ८ ।
कमणिमयकन्दर्पदर्पणसन्देहस दोहि सकलजनसम्मोहिफल फलविमललावप्यललित
मुदितमुदितमुखमण्डले ॥ ९ ॥ गहितप्रदिममहिममन्दहासासहिष्णुतदुदयस
तमोदीर्णारुणवर्णविश्रमदविडम्बितपरिणतबिम्बविदुमविलसदोष्ठयुगले ॥ १० ॥
सितदरहसितकोकनदकुन्दरदमन्धरत रोद्वत्वरविसत्वर कान्तिवीचिकमनीया मन्द
इासदनवदने ॥ ११ ॥ समुज्ज्वलतर मणितर्जिततरणिताट इनिट कन्दलितका
करम्बित कर्णशष्कुलीये ॥ १२ ॥ वहिरुपगतस्फुरणाचिगतान्तरण भूषणग
इनकोशसदस्फटिकमणिमयमितिशङ्काङ्कुरण गणपति फलितकर्णपूरकर्णावतंसताटक
लमण्डननिगनिगायमानविमल कपोलमण्डले ॥ १३ ॥ निजभुकुटी भटी भूतम्य
निटलफल
क्षद्वादशाक्षसह साक्षमभूतिसर्वसु पर्वशोभनम्रमण्डले ॥ १४ ॥
तिलकच्छविलो फकलोकविलोचन दो पचिर चितविद समवदनविधु मण्डविगलि
कापालिकानिगूढनि तनासाम स्थूलमुक्ताफलच्छ मव्यक्तदन विकनि लीन
नातिकान्तः प्रवृतश्री वामध्यो चभागकृत विभागश्रीयाग संविनिस्सृतपृधुरूलिस
जलयुगल निरक्षरी भूतगम्भीरनामिहूदा व गाढविली नदी तर पृधुसुधाधारा
युगकविमाधारविस्पष्टवक्ष्यमाणविशुद्धस्थूलमुकापसमाकायियोतितदिगन्तरे
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सकलाभरणकला बिलासकृत जाग चिरस्थाविसौदामनीशाहुरे ॥ १६
करशनाकडिणी फलनादिनि ॥ १७ ॥ निजजनता गुणमिन प्रति निकट निवेदि
८ ॥ निखिलजनामोदिनि ॥ १९ ॥ निजपतिसम्मोदिनि ॥ २० ॥ मन्थ
हि ॥ २१ ॥ मन्दमिममवेहि ॥ २२ ॥ मयि मन आहि ॥ २३
शुभमवधेहि ॥ २४ ॥ मङ्गलमयि माहि ॥ २५ ॥ अकुण्ठवैकुण्ठमहाविभूति