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आप्लवस्त्र प्रलवस्त्र
क्षारोप्यमाणस्य प्रकृतो
 

 
गतौ
इदानीं संप्रवक्ष्यामि
 
इन्द्रमझिं च ये विदुः
 
इन्द्रश्व विश्वे च देवाः
 
इमानुकं भुवना
 
इमे वै लोका अप्सु
 
इयं चाव सरघा
 
इवेन सह नित्य
इह चामुत्र चान्वेति
 
उगितश्च
 
उत्तिष्ठत मा स्वप्त
उत्पत्ति च विनाशं
 
उदरं परिमाति
 
उपचारश्चलत्वेऽपि
 
उपसर्गस्य धन्न्य
 
उपांशुच्च
ऊर्ध्वमूलमवाक
 
ऋषिभिरदात्
 
43 2
 
35 8
 
34 17
 
35
 
2
 
113
 
18
 
10 11
 
90-20, 90-23, 91-2
127-9, 128-7
 
41 7
 
अनुक्रमणिकाः
पं.
 

 
पु.
36 3
 
7 18
 
42 20
 
123 19
 
एकापरा तदन्या
एतप्रसादादिन्द्राद्याः
 
एता मत्तो न मियन्ते
 
एतामेव पुराराध्य
एवं पिण्डाण्डमुत्प
 
एवमन्योन्य संमें
एवं स्तुतो महादेवः .
 
कए ईलहीं
कबलीकृतनिःशेष
 
किरणाश्च सहस्रन्च
 
करणेन्द्रियचक्रस्थं
 
कर्तृत्वं तत्र धर्मी
 
कर्मकर्तरि कुरच्
 
कर्मणि कर्तरि च
 
कलश: स्तनौ
 
174 13
 
37 16
 
100 13 कविकल्पितकोटि
131 16 काकवद्देवदत्तगृहं
284 16 कामदेवोऽपि देवेशीं
127 11 कारणेन विना
 
कला विद्या परा शक्तेः
 
68 11 कालव्यूहः कुल
124 1 कुलयोषित् कुरूं
 
कृदभिहितो भावः
 
कृदिकारात्
 
34 18 कुछब्रुहेर्ष्या
 
""
 
103
 
5 43 15
 
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4
 
34 14
 
284 5
 
11 15
 
28 1
 
287 6
 
176 16
 
120 8
 
106 21
 
50 13
 
124 13
 
282 18
 
170 10
 
170 11
 
132 15
 
50 3
 
164 1
 
132 10
 
11 17
 
13 14
 
101 16
 
42 3
 
277 23
 
147 17
 
147 1
 
178 11
 
24