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"उत्तरभागः ।
 
देवा.....
 
ख.
 
तिमपि भवता तत्क्षणं संविधेयः ।
 
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निष्प्रत्यूहं सुखमनुभवत्वम्बुजाक्षी ... ॥ ४२ ॥
 
TH
 
टं विशेषा-
 
दित्थं सख्य..
 
...
 
प्राणालम्ब
 
...
 
शिथिलते स्वीकृतेऽपि प्रयत्नात्
 
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॥ ४३ ॥
 
हा हा निद्रे क्व नु खलु गतासीदृशीं मां त्यजन्ती
 
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अन्यासक्ते त्वयि विशरणा हन्त
 
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...
 
तासि ।
 
निर्गतं वा रुदन्ती ॥ ४४ ॥
 

 
उन्मुक्ता सा मुदितविम
 
...
 
मत्वा स्थितमिह सखे गच्छ सख्याः समीपम् ।
 
पादक्षेपं वत विधिवशादम्ब ... ... ॥ ४५ ॥
 
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भो भो य..
 
शयनात्तूर्णमुत्थाय यान्ती
 
क्व
 
ानं सुचिरमलसा हन्त जाता सखीभि-
 
दत्तालम्बा ...
 

 
॥ ४६ ॥
 
29
 
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