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प्रथममुपादाय ततो वाम - दक्ष करस्थानीये महाकाली महासरस्वत्यौ
प्रथमोत्तमचरित्रस्थे विशेषणाभ्यां गृहीते । श्यामकपर्दसमावृता
महाकाली । शैलसुता उमा ब्रह्मविद्यास्वरुपिणी केनोपनिषदि दर्शिता
महासरस्वती । महिषोऽधर्मप्रतीकरूपस्तादृशासुरमर्दिनी परा
परमोपास्या ।।१।।
 
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हे माता ! रमणीय केशपाश से शोभायमान हे शैलपुत्री । हे
महिषासुर मर्दिनी भगवती ! तुम्हारी जय हो | तुम हिमालयनन्दिनी
हो, पृथ्वी की समृद्धि विधायिनी हो, विश्व के लिये आनन्ददायिनी
हो । पूर्वकृत नन्दरायकी स्तुति से प्रसन्न होकर तुम ने नन्दगृह में
जनम लिया। और विन्ध्यवासिनी देवी बनी । दूसरी और भगवान
विष्णु (श्रीकृष्ण) के रासविलास में सहभागिनी बनी
(योगमायामुपाश्रितः) इन्द्रादि भी तुम्हारी स्तुति करने लगे । हे
भगवती! तुम शङ्कर की अर्धाङ्गिनी हो । लक्ष्मी आदि के रूप में विष्णु
आदि की भी कुटुम्बिनी हो । अनन्त विश्व की जन्मदात्री हो ।।१।।
 
Hail, Oh daughter of Mountain, who has
caused joy to the Universe, praised by Nanada,
residing on the peak of the superb mountain
Vindhya, making Vishnu manifest his sports,
praised by Indra, Oh Blessed one, consort of