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यतः
 
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मन्दस्पन्दन
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मन्दस्पन्दन
चन्दनाचलमरुद्व्या धूतचूताङ्कुर-

च्छेदास्वादकषायकण्ठमधुरख्व्याहारिपुंस्को किलाः

उत्सर्पगुद्भुजदर्पदर्पकजगत्सम्मोहनेच्छामृत-

प्रादुर्भावितमोहनाकस्त्रकुसुमाकान्ता बक्रान्ता वनान्ता इमे
।।
 
(प्रविश्य)
 
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पारिपार्श्विक:- अद्य श्रीहालास्यचैत्रोत्सवयात्राघामार्थ-
यामार्य-
मिश्रा:[^1] समापतन्ति
 

सूत्र - किं समापतन्तीति
 
[^2]।
 
अन्योन्य प्रवितन्यमान [^3]न्यमानविविधालापान्तरालापत्-
न्जानातंन्त
त-
न्नानातन्त्र
कृतान्तरखण्डनसमाधानाभिधानोर्मिला)

विद्वद्भिर्निखद्य पद्यकृतिनिस्तन्दैद्रै: कवीन्द्रैर्वृता

लब्धेयं परिषन्ममाया कवयितुर्निस्सीम भाग्योदयात् ॥६॥

 
उक्तं हि मयि स्वकृतिमर्पयता पण्डितम्मन्यदुर्जन-

संवाद निर्विण्णेन कविकुलाग्रागण्येन
 

 
[^
1. 7]T2.- मित्राः
 

[^
2. 1]T₂ omits A
 
ति
[^
3. 7]T2 प्रवितत्यमान
 
-
 
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