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श्लोकानुक्रमणिका
 
ŚLOKANUKRAMANIKA
 
1. नखस्तुतिः
 
पान्त्वस्मान् पुरुहूतवैरि बलवन्मातङ्ग
 
लक्ष्मीकान्त समन्वतोऽपि विकलयन्
 
2 वायुस्तुतिः
 
अस्तव्यतं समस्त तिगतमधमै
अस्मिन्नमस्मद् गुरुणां हरिचरणरध्यान
अस्याविष्कर्तुकामः कलिमल कलुषे
 
प
 
आ
 
आक्रोशन्तो निराशा भयभरविवशाः
आनन्दान्मन्दमन्दा ददति हि मरुतः
आज्ञामन्यैरघार्या शिरसि परिसरत्
 
उ
 
उत्कण्ठाकुण्ठकोलाहलजवविदिता
उत्तप्तात्युत्कटत्विट् प्रकटकटकटध्वान
उद्यद्विद्युत् प्रचण्डां निचरुचि निकर
 
उद्यन्मन्दस्मित श्रीमृदुमधुमधुरालाप
 
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