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त्वयाऽवलोकितस्सद्यः
 
त्वयि निहितभरोऽस्मि
 
दासभूताः स्वतः सर्वे
 
दिवि सूर्यसहस्रस्य
 
दिव्यं स्थानं अजरञ्चाप्रमेयम्
 
दुरत्यया
 
दुर्गसंसारकान्तारम्
दुर्लभा भगवद्योगभाविनो
 
दुष्करं कृतवान् रामः
 
देवानां गुह्यम्
देवि! त्वामनु नीलया
 
देवि! त्वन्महिमावधिर्न
 
देवो वैकुण्ठनाथस्तु
 
देहयोगाद्वा सोऽपि
 
दैवी ह्येषा गुणमयी
 
दोषो यद्यपि तस्य स्यात्
 
द्यौः पतेत्पृथिवी शीर्येत्
धनकनकद्युती
धन्योऽहमर्चयिष्यामि
 
न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते
 
न ते वर्णयितुं शक्ता
 
न भूतसंघसंस्थानः
 
न तस्य प्राकृता मूर्तिः
 
न तत्र सूर्यो भाति
 
न मे पार्थास्ति कर्तव्यम्
 
न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्
 
न स्मरत्यपकाराणां
 
न जीवेयं क्षणमपि विना
 
A
 
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वि.पु.१-९-१३०
 
व. स्त.९१
मं.रा.स्तो. १२
 
भ.गी. ११-१२
 
म.भा.मौस.५-२७
 
भ.गी. ७-११
 
वि.ध.१-१८
 
पौ.सं.
 
रा.सुं. १५-५३
 
.महाना.उ.१० - २२
 
श्रीगु.र.को.२६
श्रीस्तव. ८
 
ब.पौ.
 
ब्र.सू. ३-२-५
 
भ.गी.७-१४
 
रा.यु.१७-८३
 
म.भा.उ.८१-४८
 
श्रीगु.र.को.३५
वि.पु.१९-२१
 
श्वे.उ.६-८
 
वि.पु.१-९-१३३
 
म.भा.शां.२०-६-६०
 
वरा.पु.७५-४४
 
मुं.उ.२-२-१०
 
भ.गी.३-२२
 
तै. ब्रा. ३-१२-५५
 
रा. अयो. ११-१
 
रा.सुं.६६-१०
 
गद्यत्रयभाष्यम्
 
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