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( ख )
 
के तैत्तिरीयोपनिषद् का पाठ किया जाता है । इस पाठ की
समाप्ति तब होती है जब मन्दिर के महामण्डप में श्रीरङ्गनाथ
भगवान् श्री रङ्गलक्ष्मी के साथ विराजमान होते हैं ।
तैत्तिरीयोपनिषद् का अन्तिम सूक्त न्यासविद्या ( शरणागति )
का निर्देश करता है । इसी निर्देश की पूर्ति में आचार्य श्री
रामानुजाचार्य ने इस अवसर पर गद्यत्रय का गान किया ।
 
उत्सव के इस अवसर पर आजकल जब प्रबन्धपाठी
भगवान् के सामने गद्यत्रय का पाठ करते करते श्री वैकुण्ठगद्य
के छठे वाक्य तक पहुँचते हैं तो भगवान् को नैवेद्य अर्पित किया
जाता है । इस अर्पण का भाव है आत्महवि का समर्पण ।
इसके पश्चात् श्री वैकुण्ठगद्य के अन्तिम वाक्य को बोलकर
उपसंहार किया जाता है।
 
गद्यत्रय की रूपरेखा
 
गद्यत्रय के अन्तर्गत तीन गद्य गिने जाते हैं-
(१) शरणागतिगद्य, (२) श्रीरङ्गद्य और (३) श्रीवैकुण्ठगद्य ।
शरणागति गद्य को बृहद्गद्य ( पृथु गद्य ) श्रीरङ्गगद्य को
लघुगद्य तथा श्री वैकुण्ठगद्य को मितगद्य भी कहते हैं ।
शरणागति गद्य में संवाद है, श्री रङ्गगद्य में प्रार्थना है और
श्रीवैकुण्ठगद्य में उपदेश । तीनों गद्यों में मिलाकर ३६ वाक्य
हैं जिनमें ३२ गद्य में हैं
। गद्यवाक्यों की यह बत्तीस की
संख्या बत्तीस ब्रह्मविद्याओं के शरणागति विद्या में पर्यवसान
का संकेत करती है ।