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( ३० )
 

 
कोकिलादिभिः कोमलकूजितैराकु लैर्दिव्योद्यानशतसहस्रं रैरावृते, ७
 
मरिग

 
मणि​​
मुक्ताप्रवालकृत - सोपाननैर्दिव्यामलामृतरसोदककै-

र्
दिव्याण्डजवरैरतिरमरगीणीयदर्शनैरतिमनोहर- मधुरस्वरैराकुलैः
श्र

अ
न्तः स्थमुक्तामय दिव्यक्- दिव्यक्रीडास्थानोपशोभिर्तदिव्य तैर्दिव्यसौगन्धिक-

वापीशतसहस्रं रैर्दिव्यराजहंसावलीविराजतैरावृते, ८
 

 
निरस्तातिशयानन्दै करसतया चानन्त्याच्च प्रविष्टानुन्मा-

दर्यायद्भिः क्रीडोद्द देशैर्विराजिते तत्र तत्र कृतदिव्यपुष्पपर्यङ्कोपशोभिते
 
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आदि दिव्य पक्षियों के कोमल कलरवों से व्याप्त शतसहस्रकोटि

दिव्य उद्यान प्रआस्थानमण्डप को घेरे हुए हैं । ७
 

 
लाखों दिव्य सुगन्धियुक्त बावलियाँ प्रआस्थानमण्डप को

घेरे हुए हैं। इन बावलियों में उतरने के लिये मरिणणि, मुक्ता

और मूंगों की सीढ़ियाँ हैं। इनमें दिव्य निर्मल अमृत रस

भरा है । दिव्यपक्षी, जो देखने में अत्यन्त सुन्दर लगते हैं,

जिनके मधुर स्वर अति मनोहर लगते हैं, इन बावलियों में

विद्यमान रहते हैं । उनके भीतर मुक्तामय दिव्य क्रीड़ास्थान बने

हुए हैं। दिव्य राजहंसों की पंक्तियाँ भी यहाँ रहती हैं।
 
८
 
आस्थानमण्डप में कितने ही क्रीडास्थल हैं जो सर्वाधिक

आनन्दैकरसस्वभाव एवं अनन्त होने के कारण प्रवेश करने-

वालों को आनन्दोन्माद से उन्मत्त कर देते हैं । आस्थानमण्डप

के विभिन्न भागों में दिव्य पुष्पों के पर्यंक शोभायमान हैं।

नाना प्रकार के पुष्पों का रसपान कर उन्मत्त भ्रमरों की