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॥ श्रीः ॥
 

 
॥ श्रीमते रामानुजाय नमः ॥

 
श्रीभगवद्रामानुज-विरचित- गद्यत्रये, प्रथमं

 
॥ शरणागतिगद्यम् ॥
 

 
यो
नित्यमच्युतपदाम्बुजयुग्म रुक्म
-
व्यामोहतस्तदितराणि तृणाय मेने ।

अस्मद्गुरोभंर्भ​गवतोऽस्य दयैकसिन्धो
 

रामानुजस्य चरणौ शरणं प्रपद्ये ॥
 

 
वन्दे वेदान्तकर्पूरचामीकरकरण्ड​कम् ।

रामानुजार्यमार्याणां चूडामणिमहर्निशम् ॥
 
मी
 
इस
 

 
 
जो नित्य भगवान् के युगल चरणारविन्दरूपी सुवर्ण के

मोह के कारण उनसे भिन्न समस्त पदार्थों को तिनके के समान

समझते थे उन एकमात्र दया के सागर अपने गुरुदेव भगवान्

श्री रामानुजाचार्य के चरणों की शरण ग्रहण करता हूँ ॥१॥
 

 
जो वेदान्तरूपी कर्पूर की रक्षा के लिये सुवर्ण की पेटी

के समान हैं, उन आचार्यचूडामणि श्री रामानुजाचार्य को मैं

अहर्निश प्रणाम करता हूँ ॥२॥