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( प )
 
२०. शौर्य - विरोधियों में भी निर्भयता से प्रवेश करने में
 
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भगवान् समर्थ हैं ।
 
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२१. पराक्रम - अपनी सामर्थ्य से विरोधियों को छिन्न-भिन्न
करने में वे सदा समर्थ हैं ।
 
२२. सत्यकाम - सत्यकामत्व भगवान् का एक गुरण है । इसके
कारण उनके तथा उनके भक्तजनों के भोग्य
पदार्थ सदा उपस्थित रहते हैं ।
 
२३. सत्यसंकल्प - सत्यसंकल्पत्व भी भगवान् का एक गुण
है। इसके कारण भगवान् श्रपूर्व भोग्य
पदार्थों की सृष्टि तत्काल करते हैं । इस
जगत से लेकर वैकुण्ठधाम पर्यन्त सर्वत्र
भगवान् का यह संकल्प अमोघ रहता है ।
 
२४. कृतित्व - उपकार करना भगवान् का स्वभाव है ।
२५. कृतज्ञता - दूसरों के द्वारा किये गये थोड़े उपकार को
भी सदा स्मरण रखते हैं ।
 
२६. श्रियःपतित्व- भगवान् श्रियः पति अर्थात् श्रीशब्दवाच्या
लक्ष्मी के पति हैं । लक्ष्मी के स्वरूप, रूप,
गुण, वैभव एवं ऐश्वर्य शील आदि असंख्य
कल्याण गुरण भगवान् के अभिमत एवं
अनुरूप हैं । लक्ष्मी प्रौर नारायण दिव्य-
दम्पती हैं। दोनों ही उपाय एवं प्राप्य हैं ।
शरणागति में लक्ष्मी का पुरुषकार भी
है । इस प्रकार पुरुषकार, उपाय और