This page has been fully proofread once and needs a second look.

गोविन्द - दामोदर-स्तोत्र
 
२२ ]
 
( ५० )
 

 
संसारकूपे पतितोऽत्यगाधे
 

मोहान्धपूर्ण विषयाभितप्ते ।
 

करावलम्बं मम देहि विष्णो
 

गोविन्द दामोदर <error>माघवेति </error> <fix>माधवेति</fix>

 
( ५१ )

 
त्वामेव याचे मम देहि <error>जिहे
 
</error> <fix>जिह्वे</fix>
समागते दण्डधरे कृतान्ते ।
 

वक्तव्यमेवं मधुरं सुभक्त्या
 

गोविन्द दामोदर माधवेति ॥

 
( ५२ )

 
भजस्व मन्त्रं भवबन्धमुक्त्यै
 

<error>जिहे</error> <fix>जिह्वे</fix> <error>रसशे</error> <fix>रसज्ञे</fix> सुलभं <error>मनोशम्</error> <fix>मनोज्ञम् </fix>।
द्वैपायनाद्यैर्मुनिभिः
 
जिहे रसशे सुलभं मनोशम् ।
प्रजप्तं

गोविन्द दामोदर माधवेति ॥

 
( ५३ )

 
गोपाल वंशीधर रूपसिन्धो
 

लोकेश नारायण दीनबन्धो ।
 

उच्चस्वरैस्त्वं वद <error>सर्वदेव
 
</error> <fix>सर्वदैव</fix>
गोविन्द दामोदर माधवेति ॥

 
( ५४
)
 
जिह्वे सदैवं भज सुन्दराणि
 

नामानि कृष्णस्य मनोहराणि ।

समस्तभक्तार्तिविनाशनानि
 

गोविन्द दामोदर माधवेति ॥