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देवी स्तोत्राणि
 
मुच्यते नात्र सन्देहो भुवि स्वर्गे रसातले ।
सर्वं वा श्लोकमेकं वा यः पठेद्भक्तिमान् सदा ॥
स सर्वं दुष्कृतं त्यक्त्वा प्राप्नोति परमं पदम् ।
पठनादस्य देवेशि किं न सिध्यति भूतले ॥
स्तवराजमिदं देवि संक्षेपात्कथितं मया ॥
 
॥ इति आपदुद्धारक दुर्गा स्तोत्रम् संपूर्णम् ॥
 
१०. त्रिपुरसुन्दरी अष्टक स्तोत्रम्
 
कदम्बवन-चारिणीं
 
मुनि-कदम्बकादंबिनीं
 
नितम्ब -जित-भूधरां
सुरनितंबिनी - सेविताम् ।
नवांबुरुह - लोचना-
 
मभिनवांबुद - श्यामलां
त्रिलोचन-कुटुम्बिनीं
त्रिपुरसुन्दरीम् आश्रये ॥
कदम्बवन-वासिनीं
 
कनक - वल्लकी - धारिणीं
 
महार्हमणि -हारिणीं
 
मुख- समुल्लसद्वारुणीम् ।
दयाविभव - कारिणीं
 
विशद - लोचनीं चारिणीं
 
त्रिलोचन - कुटुम्बिनीं
त्रिपुरसुन्दरीम् - आश्रये ॥
 
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