2023-04-25 15:55:44 by श्री अयनः चट्टोपाध्यायः

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ग्गुलिया -- व्याधि -विशेष- - 'तस्स संकाए वग्गुलिया वाही जातो'
( निचू १ पृ १५ ) ।
बग्गेज्ज -- प्रचुर ( दे ७ ३८) ।
) ।
बग्गोअ -- नकुल, न्यौला ( दे ७।४० ) ।
वग्गोरमय -- रूक्ष, रूखा ( दे ७ ५२ ) ।

बग्घरणसाला -- तोसलि देश में प्रसिद्ध विवाह मंडप (बृभा ३४४६ ) -
'व्याघरणशाला नाम तोसलिविषये ग्राममध्ये शाला क्रियते,
तत्राग्निकुण्डं स्वयंवरहेतोर्नित्यमेव प्रज्वलति, तत्र च
बहवरचेटका: एका च स्वयंवरा चेटिका प्रवेश्यन्ते इत्यर्थः ।
यस्तेषां मध्ये तस्यै प्रतिभाति तमसौ वृणीते, एषा व्याधरण-
शाला' ( टी पृ ९६३) ।
) ।
वग्घाअ -- १ साहाय्य, मदद । २ विकसित, खिला हुआ ( दे ७।८६ ) ।
वग्घाडिया -- १ उपहास के लिए की जाने वाली -विशेष ध्वनि
 
(
( ज्ञा १।८।१४६ ) । २ विभिन्न देशों की भाषाओं को इस
प्रकार बोलना जिससे सब हंसने लग जायें ( बुभा ६३२४ ) ।
बग्घाडी -- उपहास के लिए की जाती एक प्रकार की आवाज- अप्पे गइया
वग्घाडीआं करेंति' ( ज्ञाटी प १५१ ) ।


 
वग्धारित -- प्रलंबित ( जीव ३।३९७ ) ।
वग्घारिय- -- प्रलम्बित-वग्धारिय-पाणी एगपोग्गल निविट्ठदिट्ठी'
( भ ३।१०५ ) ।

बच्चाई -- क्षुद्र जंतु- विशेष - 'भिंगारी अरका व त्ति वचाई इंदगोविगी
( अंवि पृ ६९ ) ।

३६३
 
वच्च -- १ घर के चारों ओर की भूमी, - 'गिहस्स समंततो वच्चं भण्णति'
(
( निचू २ पृ २२४ ) । २ मृतक के दग्ध-स्थान के चारों ओर की
भूमि । ३ श्मशान के चारों ओर की भूमि-'मडयपेरंतं वच्चं भण्णति ।
सव्वं वा सीताणं सीताणस्स वा पेरंतं वच्चं भण्णति'
 
(
( निचू २ पृ २२५ ) । ४ कूड़ा-करकट का स्थान ( आचूला १०।२६ )
वच्चक -- दर्भ जैसा तृण ( बृभा ३६७५) ।
) ।
वच्चग -- १ तृणरूप वाद्य-विशेष ( जीव ३५८८ ) २ तृण- विशेष - 'वच्चगो
दब्भागिती तणं' ( निचू २ पृ ३८ ) ।

वच्चयचिप्प -- वल्वज घास को कूटकर बनाया हुआ ( रजोहरण)
(
) ( बुभा ३६७४) ।
 
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) ।