2023-04-25 15:52:24 by श्री अयनः चट्टोपाध्यायः

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देशी शब्दकोश
 
बग्गुलिया- व्याधि विशेष- तस्स संकाए वग्गुलिया वाही जातो'

( निचू १ पृ १५ ) ।

बग्गेज्ज – प्रचुर (दे ७ ३८) ।
 

 
बग्गोअ – नकुल, न्यौला ( दे ७४०) ।

वग्गोरमय - रूक्ष, रूखा ( दे ७ ५२ ) ।
 

 
बग्घरणसाला --तोसलि देश में प्रसिद्ध विवाह मंडप (बृभा ३४४६ ) -

'व्याघरणशाला नाम तोसलिविषये ग्राममध्ये शाला क्रियते,

तत्राग्निकुण्डं स्वयंवरहे तो र्नित्यमेव प्रज्वलति, तत्र च

बहवरचेटका: एका च स्वयंवरा चेटिका प्रवेश्यन्ते इत्यर्थः ।

यस्तेषां मध्ये तस्यै प्रतिभाति तमसौ वृणीते, एषा व्याधरण-

शाला' ( टी पृ ९६३) ।
 

 
ग्घाअ – १ साहाय्य, मदद । २ विकसित, खिला हुआ (दे ७।८६) ।

ग्घाडिया – १ उपहास के लिए की जाने वाली विशेष ध्वनि
 

 
(ज्ञा ११५१।८।१४६) । २ विभिन्न देशों की भाषाओं को इस

प्रकार बोलना जिससे सब हंसने लग जायें (बुभा ६३२४ ) ।

बग्घाडी- उपहास के लिए की जाती एक प्रकार की आवाज- अप्पे गइया

वग्घाडीआं करेंति' (ज्ञाटी प १५१ ) ।
 

 

 

 
वग्धारित - प्रलंबित ( जीव ३।३९७ ) ।

वग्घारिय-प्रलम्बित-वग्धारिय-पाणी एगपोग्गल निविट्ठदिट्ठी'

( भ ३१०५ ) ।
 

 
बच्चाई - क्षुद्र जंतु- विशेष - भिंगारी अरका व त्ति वचाई इंदगोविगी

( अंवि पृ ६९ ) ।
 

 
३६३
 

 
वच्च
-१ घर के चारों ओर की भूमी, - 'गिहस्स समंततो वच्चं भण्णति'

(निचू २ पृ २२४) । २ मृतक के दग्ध-स्थान के चारों ओर की

भूमि । ३ श्मशान के चारों ओर की भूमि-'मडयपेरंतं वच्चं भण्णति ।

सव्वं वा सीताणं सीताणस्स वा पेरंतं वच्चं भण्णति'
 

 
(निचू २ पृ २२५ ) । ४ कूड़ा-करकट का स्थान (आचूला १०।२६)

च्चक–दर्भ जैसा तृण (बृभा ३६७५) ।
 

 
च्चग - १ तृणरूप वाद्य-विशेष (जीव ३१५८८) २ तृण- विशेष - वच्चगो

माब्भागिती तणं' (निचू २ पृ ३८ ) ।
 
(रजोहरण )
 

 
वच्चयचिप्प- वल्वज घास को कूटकर बनाया हुआ
(रजोहरण)
(बुभा ३६७४) ।
 

 
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