2023-04-15 15:41:33 by श्री अयनः चट्टोपाध्यायः

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माभाइ -- अभय-दान ( दे ६।१२९ ) ।
माभीसिअ -- अभय-दान ( दे ६।१२९ वृ ) ।
मामणा -- ममता, ममकार - 'मामण त्ति ममीकारार्थे देशीवचनम्' ( आवहाटी १ पृ ८६ ) ।
मामा -- मातुलानी, मामी ( दे ६।११२ ) ।
मामि -- सखी का आमंत्रण-शब्द ( दे ६।१२८ वृ ) ।
मामिया -- मामी, मातुलानी ( विपा १।३।१४ ) ।
मामी -- मामा की पत्नी, मामी- मामी शब्दोऽपि देश्य:' ( दे ६।११२ वृ ) ।
मायंद -- आम्र ( दे ६।१२८ ) ।
मायंदी -- श्वेतपटा साध्वी, श्वेत वस्त्र धारण करने वाली संन्यासिनी ( दे ६।१२९ ) - 'मायंदी उवदिसइ' ( वृ ) ।
मायार -- मदारी, बन्दर पकड़ने वाला ( बृटी पृ ८९ ) ।
मार -- मणि का लक्षण-विशेष ( जंबूटी प ३२ ) ।
मारामारी -- मारपीट ( पिटी प १५० ) ।
मारिलग्गा -- कुत्सिता ( दे ६।१३१ ) ।
माल -- १ खाद्य पदार्थ आदि रखने के लिए ऊपर बनाया गया मंच ( द ५।१।६९ ) । २ घर का ऊपरि भाग, दूसरी मंजिल - मालो घरोवरिं होति' ( भटी प २७४ ) । ३ समूह ( आवहाटी २ पृ ८९ ) । ४ मञ्च, आसन-विशेष ( ज्ञाटी प ७२; दे ६।१४६ ) । ५ आराम, बगीचा । ६ सुन्दर ( दे ६।१४६ ) । ७ गुच्छ वनस्पति-विशेष ( प्रज्ञा १।३७।५ ) ८ चिनकर बनाई हुई पाल - :सण्हकट्ठेहि य मालं
करेंति, चिक्खिल्लेणं लिंपइ कंटयछायाए व उच्छाएइ'
( आवहाटी २ पृ ८९ ) । ९ देश-विशेष ।
मालग -- घर का ऊपरी भाग, मंजिल ( जीभा १२७० ) ।
मालय -- म्लेच्छ विशेष जो मनुष्यों का अपहरण करते हैं
( व्यभा ४।४ टी प १३ ) ।
मालां -- ज्योत्स्ना, चांदनी ( दे ६।१२८ ) ।
मालाकुंकुम -- प्रधान कुंकुम, श्रेष्ठ कुंकुम ( दे ६।१३२ ) ।
मालि -- वृक्ष-विशेष ( समप्र २३१ ) ।
मालुका -- पक्षिणी-विशेष - उलुकी मालुका व त्ति सेणा' ( अंवि पृ ६९ ) ।
मालुग -- श्रीन्द्रिय जन्तु -विशेष ( उ ३६।१३७ ) ।
मालुय -- तीन इन्द्रिय वाले जन्तु-विशेष ( प्रज्ञा १।५० ) ।