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एफ. आर. हार्नले', श्री आर. जी. भण्डारकर, डॉ. पी. डी. गुणे भी
इस कथन से सहमत हैं । जार्ज ग्रियर्सन के अनुसार देशी शब्दों का संबंध
वैदिक काल से पूर्व आर्यों द्वारा बोली जाने वाली जनभाषाओं से है । प्रथम
प्राकृत से उद्भूत होने के कारण देशी शब्दों को तद्भव कहा जा सकता है । "
 
ए. एन. उपाध्ये तथा पी. एल. वैद्य' ने भी देशीशब्दों की उत्पत्ति
तथा उसके स्वरूप के बारे में पर्याप्त चिन्तन किया है ।
देशी शब्द का प्रयोजन
 
प्राचीनकाल में गुरु के पास विभिन्न प्रदेशों के शिष्य दीक्षित होते थे ।
वे सूत्रों के गूढ़ रहस्यों को सरलता से समझ सकें, इस दृष्टि से प्रशिक्षक
विभिन्न देशों में प्रचलित एक ही अर्थ के वाचक भिन्न-भिन्न शब्दों का प्रयोग
करते थे। यहां दशवकालिक सूत्र का भाषा प्रयोग विषयक एक प्रसंग द्रष्टव्य
है। वहां कहा गया है कि मुनि इन संबोधनों से स्त्री को सम्बोधित न
करे-
हले हले त्ति अन्नेत्ति, भट्टे सामिणि गोमिणि ।
होले गोले वसुले त्ति, इत्थियं नेवमालवे ॥ ( ७॥१६)
ये शब्द विभिन्न प्रदेशों में प्रचलित सम्बोधन - शब्दों का परिज्ञान कराते
हैं । दशवैकालिक सूत्र की अगस्त्यचूर्णि के अनुसार तरुणी स्त्री के लिए
महाराष्ट्र में 'हले' एवं 'अन्ने' संबोधन का प्रयोग होता था । लाट ( मध्य
और दक्षिणी गुजरात) देश में 'हला' तथा 'भट्ट', गोल देश में 'गोमिणी' तथा
'होले', 'गोले', 'वसुले' – ये शब्द संबोधनरूप में प्रयुक्त होते थे । दशवै कालिक
सूत्र की चूर्णि में भोजन के लिए प्रयुक्त संदेण, वंजण, कुसण, जेमण आदि शब्द
भिन्न-भिन्न प्रान्तों में इनके प्रचलन का संकेत देते हैं – भिण्णदेसिभासेसु
जणवदेसु एगम्मि अत्थे संदेणवंजणकुसणजेमणाति भिण्णमत्थपच्चायण समत्थम-
विप्पडिवत्तिरूवेण । S
 
१. कम्पेरेटिव ग्रामर आफ गौडियन लेंग्वेजेज, पृ ३६-४० ।
२. विल्सन फिलोलोजिकल लेक्चर्स, पृ १०६ ।
 
३. इन्ट्रोडक्शन टु कम्पेरेटिव फिलोलोजी, पृ २७५-२७७ ।
 
४. लिंग्विस्टिक सर्वे आफ इण्डिया, पृ १२७,१२८ ।
 
५. कन्नडीज वईज इन देशी लेक्सिकन्स, जिल्द १२, पृ १७१,१७२ ।
 
६. औब्जर्वेशन आन हेमचन्द्राज देशीनाममाला, जिल्द ८, पृ ६३-७१ ।
७. दशवैकालिक, अगस्त्यचूर्ण, पृष्ठ १६८ : हले अन्नेति मरहट्ठेसु तरुणित्थी
मामंतणं । हलेति लाडेसु । भट्टति "लाडेसु । सामिणित्ति सव्वदेसेसु ।
गोमिणी गोल्लविसए । होले गोले वसुले त्ति देसीए ।
८. दशवैकालिक, जिनदास चूर्णि, पृष्ठ १६०
 
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