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कहता तो वह उसे कान लगा कर सुनती जैसे अपने प्रिय के प्रशंसापूर्ण नर्म-

वचनों को श्रोत्र-पुटों से पी जाती थी, या प्रिय के द्वारा श्रोत्र-पुटों से पीने योग्य

वचन कहती थी । इस प्रकार जैसे शिव के प्रति नर्मकर्म में उद्यत होती थी वैसे

ही महिष के प्रति रणकर्म में उद्युक्त होने वाली पार्वती थापकी रक्षा करे । '
 
[^१]
 
इस पद्य में श्लिष्ट पदों द्वारा रणकर्मोचित और नर्मकर्मोचित परस्पर
 

विरुद्ध -रसात्मक चेष्टाओं के युगपद् वर्णन का चमत्कार है । यह सुश्लेष-सन्नि-

वेशपटु बाण का ही सामर्थ्य है । श्रमरुकशतक के टीकाकार अर्जुनवर्मदेव ने

भी इस पद्य को उद्धृत किया है, जिसमें उसने चण्डीशतक के कर्ता के रूप में

बाणभट्ट को स्पष्ट स्वीकार किया है ।
 
[^२]
 
महिष-वध के अनन्तर उपद्रव शान्त हो जाने पर जब शिव और पार्वता
ती
उस घटना की बातें करने लगे तो देवी (पार्वती) ने शम्भु का इस प्रकार परिहास

किया- -'महिष के कठोर शृङ्गों से मेरु पर्वत का शरीर क्षत-विक्षत हो गया,

इस पर मुझे क्रोध नहीं प्राया; नदियों के स्वामी (समुद्र) रीते हो गए, यह भी

अच्छा ही हुआ क्योंकि इससे कोई निःसपत्न हो गया, ( नदी होने के कारण

गङ्गा समुद्र की भी पत्नी है और शङ्कर भी उसे पत्नी बना कर सिर चढ़ाए हुए

हैं, अब रीते हो जाने के कारण समुद्रों के न रहने पर कोई (शिव) निस्सपत्न

हो गया, अच्छा हुआ ) ; परन्तु, मुझे यह सहन नहीं हुआ कि हमारे शिवजी

महाराज जिसको माथे पर धारण करने योग्य मानते हैं वह गङ्गा महिष के
 

 
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] दृष्टावासक्तदृष्टिः प्रथममिव तथा सम्मुखीनाऽभिमुख्ये

स्मेरा हासप्रगल्भे प्रियवचसि कृतश्रोत्रपेयाधिकोक्तिः ।

उद्युक्ता नर्मकर्मण्यवतु पशुपती पूर्ववत् पार्वती वः

कुर्वाणा सर्वमीषद् विनिहितचरणालक्तकेव क्षतारिः ॥ ३७
 

 
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.] टीकाकार ने लिखा है--'उपनिबद्ध'धं च भट्टबाणेनैवंविध एव सङ्ग्राम -प्रस्तावे देव्यास्त-

त्तद्भङ्गिभिभंर्भगवता भर्गेण सह प्रीतिप्रतिपादनाय बहुधा नर्म यथा दृष्टावसक्त-
दृष्टिरिति ।
 
प्र

 
मरुकशतक का यह श्लोक भी यहाँ द्रष्टव्य है-
T
 
-
 
क्षिप्तो हस्तावलग्नः प्रसभमभिहतोऽप्याददानोंऽशुका तं

गृह्णन् केशेष्वपास्तचरणनिपतितो नेक्षितः सम्भ्रमेण ।

आलिङ्गन् योऽवधुतस्त्रिपुरयुवतिभिः साश्रुनेत्रोत्पलाभिः

कामीवार्द्रापराधः स दहतु दुरितं शाम्भवो वः शराग्निः ॥ २॥
 
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