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सम्पादकीय
 
२१
 
यह संसार, बचपन, जवानी और बुढ़ापे के रूप में किसी के आगे है, किसी
के इर्द गिर्द फैला है और किसी के पीछे छूट गया है। शिशु के लिये सुलभ
नहीं वह उसे आदर दे, युवक को मिला है तो उसे भोगे पर हे वृद्ध ! विषयों
से बाहर धकेले जाकर भी तुम क्यों मुड़ मुड़ कर पीछे देख रहे हो ?
 
मुक्तक काव्यों का एक अन्य वर्ग स्तोत्रमुक्तक काव्यों का है जिनमें किसी
न किसी इष्टदेव की स्तुति मिलती है। आनन्दवर्धन का देवीशतक, कल्हण
का अर्धनारीश्वरस्तोत्र, सर्वज्ञमित्र का स्रग्धरास्तोत्र, लोष्टक का
दीनाक्रन्दनस्तोत्र, अवतार का ईश्वरशतक इसी कोटि में आते
हैं। देवीशतक में चित्रबन्धों से अलंकृत शैली में पार्वती की स्तुति के पद्य
हैं । कल्हण के अर्धनारीश्वर स्तोत्र में शार्दूलविक्रीडित छन्द में रचित
18 पद्य हैं। स्रग्धरास्तोत्र में स्रग्धरा छन्द में रचित 31 पद्यों में तारादेवी
की स्तुति की गई है। अवतार का ईश्वरशतक लङ्कारिक शैली में
रचित शिवस्तुति के पद्यों का संग्रह है। अनेक प्रकार के यमक, आदि
अनुप्रास
शब्दालङ्कारों तथा अनेकविध चित्रबन्धों से ईश्वरशतक और देवीशतक
की शैली दुरूह हो गई है। यह दुरूहता एवं कृत्रिमता निम्नलिखित श्लोकों में
देखी जा सकती है—
 
रक्षावतारं गम्भीरं भवमुग्रं हरेश्वर ।
नय नीतिगुणं तं तु ममताप्रियतामिमाम् ॥
 
रसारसा सारसार सारसाररसारसा ।
 
रसा रसासारसारसारसाररसारसा ॥
 
( ई०श०, २ )
 
( ई०श०, ७१ )
 
महदे सुरसं धम्मे तमवसमासङ्गमागमाहरणे ।
हरबहुसरणं तं चित्तमोहमवसरउ उमे सहसा ॥ ( ई०श०७६)
(संस्कृतमहाराष्ट्रभाषाश्लेषः)
 
इस अलङ्कृत शैली से भिन्न शैली में रचित एक स्तोत्र लोष्टक का
दीनाक्रन्दनस्तोत्र है । काव्यसौन्दर्य की दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण
न होने पर भी इसमें भक्त की दीनता और व्याकुलता का सुन्दर वर्णन है ।
54 पद्यों के इस स्तोत्र में कवि कहीं शिव को उलाहना देता है तो कहीं
अपनी दीनता की दुहाई देकर दुःखों से बचाने की प्रार्थना करता है-
1. इसी शैली के स्तोत्रसमुच्चय भाग १, घड्यार पुस्तकालय तथा अनुसन्धान संस्थान,
अड्यार, मद्रास से 1969 ई० में प्रकाशित हुए हैं।
 
CC-0 Shashi Shekhar Toshkhani Collection. Digitized by eGangotri