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सम्पादकीय
 
१७
 
पति बहुत दिनों बाद घर लौटा है । उसे देखते ही सुनयना गृहिणी की
आँखों में हर्ष के आँसू भर आये हैं । भावविभोर होकर वह अपने आँचल से
उस घोड़े के गले की धूल झाड़ने लगती है जो उसके प्रिय को घर तक ले आया
है । प्रेमातिरेक का कैसा स्वाभाविक अङ्कन है ।
 
अन्तिम परिच्छेद में सांसारिक वस्तुओं की क्षरणभंगुरता और वैराग्य की
महत्ता का प्रतिपादन है । कवि कहता है—
 
न कस्य कुर्वन्ति शमोपदेशं स्वप्नोपमानि प्रियसङ्गतानि ।
जरानिपीतानि च यौवनानि कृतान्तदष्टानि च जीवितानि ॥
S
 
अनुष्टुप् छन्द में रचित चारुचर्या के १०१ पद्यों में दैनिक सद्व्यवहार
की बातों की चर्चा है । प्रत्येक पद्य की प्रथम पंक्ति में उपदेशात्मक उक्ति है
तथा दूसरी पंक्ति उसी उक्ति के समर्थन में किसी प्रसिद्ध घटना की ओर संकेत
करती है । निम्न श्लोकों में अश्वत्थामा, धृतराष्ट्र और जनमेजय के नाम लिये
गये है—
 
THIR
 
( च०स०, ४)
 
कुर्याद् वियोगदुःखेषु धैर्यमुत्सृज्य दीनताम् ।
अश्वत्थामवधं श्रुत्वा द्रोणो गतधृतिर्हतः ॥ ( चा०च०, ४०)
न पुत्रायत्तमैश्वर्यं कार्यमार्यैः कदाचन ।
(पुत्रापित प्रभुत्वोऽभूद धृतराष्ट्रस्तृणोपमः । (चा०च०, ८० )
 
ईर्ष्या कलहमूलं स्यात् क्षमा मूलं हि सम्पदाम् ।
 
ईर्ष्या दोषाद् विप्रशापमवाप जनमेजयः । (चा०च०, १२)
 
५. चौरपञ्चाशिका : दक्षिरण देश के चालुक्य वंश के अन्तिम शासक
सोमेश्वर चतुर्थ (११८२ ई०) के सभाकवि बिल्हण ने चौरपञ्चाशिका
मुक्तक लिखा है । यह विशुद्ध रूप से शृङ्गारमुक्तक है और इसके सभी श्लोक
'अद्यापि' पद से प्रारम्भ होते हैं। पद्यों की सरलता, प्रवाह, सङ्गीत तथा
ऐन्द्रियकता प्रभावोत्पादक हैं। विरह की सूचनामात्र से विषण्ण होने वाली
नायिका के अवसाद का स्मरण नायक को शोकातुर कर रहा है-
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अद्यापि तां गमनमित्युदितं मदीयं
 

 
श्रुत्वैव भीरुहरिणीमिव चञ्चलाक्षीम् ।
वाचा स्खलद्विगलदश्रुजलाकुलाक्ष
 
सञ्चिन्तयमि गुरुशोकविनम्रवक्त्रम् ॥ ( चौ०प०, २८ )
 
CC-0 Shashi Shekhar Toshkhani Collection. Digitized by eGangotri