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ने
 
को गाली देना प्रारम्भ कर दिया था । शङ्करवर्मा का राज्यकाल ८८३ ई०
से ६०२ ई० तक था। अतः भल्लट का समय ध्वीं शताब्दी का उत्तरार्ध
तथा दसवीं शताब्दी का पूर्वार्घ माना जा सकता है । सम्भवतः मल्लट
• शङ्करवर्मा के पिता अवन्तिवर्मा का वह राज्यकाल भी देखा था जिसमें मुक्ता-
कण, शिवस्वामी, आनन्दवर्धन तथा रत्नाकर जैसे महाकवियों को सम्मान
प्राप्त हुआ था । रत्नाकर, शिवस्वामी तथा आनन्दवर्धन जैसे प्रौढ़ महा-
होंगे।
 
भल्लटशतकम्
 
तभी कल्हण ते इन नामों के साथ भल्लट को नहीं रखा ।
 
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५. भल्लटशतक को
 
व्यङ्ग्योक्तियाँ
 
तत्कालीन समाज के उच्च वर्ग के अयोग्य व्यक्तियों के ऊपर फब्तियां कसी हैं।
भल्लट ने भल्लटशतक में अन्यापदेश अथवा अन्योक्ति का आधार लेकर
इन उक्तियों में कथन का विषय जडपदार्थ एवं पशु, पक्षी आदि प्राणी रहते
हैं। परन्तु जो बात इन पदार्थों तथा प्राणियों पर घट रही होती है वही बात
इनके अतिरिक्त अन्य व्यक्तियों पर भी चरितार्थ होती है। भल्लट की इन
उक्तियों में कविहृदय की मार्मिक पीड़ा तथा तत्कालीन समाज के प्रति तीव्र
प्रतिक्रिया पूर्ण मनःस्थिति दिखाई पड़ती है। इन में से कतिपय व्यङ्ग्योक्तियाँ
 
यहाँ दिखाई जा रही हैं ।
 
परिचित भल्लट ने जब शङ्करवर्मा के राज्य में विद्वानों की उपेक्षा और जनता
मान्धाता जैसे उदारहृदय अवन्तिवर्मा के राज्यकाल की सुखसुविधाओं से
का शोषरण देखा तो उनका पीड़ित कविहृदय सूर्य और अन्धकार के प्रतीक के
 
माध्यम से बोल उठा-
पात: पूष्णो भवति महते नोपतापाय यस्मात्
 
• कालेनास्तं क इह न ययुर्यान्ति यास्यन्ति चान्ये ।
व्यथयतितरां लोकबाह्यैस्तमोभि-
स्तस्मिन्नेव प्रकृतिमहति व्योम्नि लब्धोऽवकाशः ॥
 
एतावत्तु
 
1. त्यागभीरुतया तस्मिन् गुणिसङ्गपराङ्मुखे । आसेवन्तावरा वत्तीः कवयो भल्लटादयः ॥
 
नवंतनास्सुकवयो भाटिको लवटस्त्वभूत् । प्रासादात्तस्य ।
 
कल्पपालकुले जन्म तत्तेनैव प्रमाणितम् । क्षीबोचितापभ्रंशोक्ते देवी वाग् यस्य चाभवत् ॥
 
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दीनारसहस्रद्वय वेतन:
 
- राजतरङ्गिणी, ५, २०४६
 
2. मुक्ताकण: शिवस्वामी कविरानन्दवर्धनः ।
 
प्रथां रत्नाकरश्चागात् साम्राज्येऽवन्ति वर्मणः ॥ वही
 
CC-0 Shashi Shekhar Toshkhani
 
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( भ०श०, ११ )