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शक्रो वा भवतु
शत्रुपक्षमुपा
 
अभिषेक नाटके ।
 
I. 10 समुदितवरचाप
 
III. 24
 
शरनिर्भिन्न
 
I. 24
 
सम्प्राप्ता हरिवर
सव्येन चापम
 
शरवरपरिपीत
 
VI. 13
 
सीते! त्यज त्वं
 
शरैर्भीमवेगै
 
VI. 15
 
सीते! त्यजत्व
 
शासितोsहं त्वया
 
III. 26
 
सीते भावं परि
 
II. 25
 
I.
VI.
 
377770
 
II. 14
 
V.
 
V. 9
 
शैलैर्दुमैः सम्प्रति
 
IV.
 
6
 
सुग्रीवेणाभिमृष्टा
 
I. 21
 
श्रुत्वा कालवशं
 
1. 23
 
सुरवरजयदर्प
 
VI. 12
 
संवृत्तं तुमुलं
 
सजलजलदम
सजलजलधरे
 
III. 10
 
स्थानाक्रामण
 
VI. 16
 
IV. 5
 
स्वसैनिको न
 
IV. 19
 
IV. 3
 
हत्वा रावणमा
 
VI. 19
 
सन्दष्टष्ठश्चण्ड
समावृतं सुर
 
I. 13
 
हत्वा वालिनमा
 
II.
 
22
 
V.
 
17
 
हा वत्स ! सर्व
 
V.
 
123
 
५२