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लोकानुक्रमणिका ।
 
दिव्यास्त्रैस्त्रिदशे
धर्मार्थत
देवाः सेन्द्रा
देवाः सेन्द्रादयो
देवे यथा वयं
 
III. 17
 
३७१
 
III. 25
 
IV. 8
 
मया कृतं दोप
 
I. 26
 
v. 12
 
मयोको मैथिली
 
III.
 
13
 
II.
 
18
 
मानुषं रूपमा
 
IV.
 
14
 
IV.
 
10 मुक्तो देव !
 
I.
 
5
 
धनुषि निहित
 
v. 15
 
यद्यहं रावणं
 
II.
 
16
 
नक्तञ्चरापसद !
 
III. 21
 
यमवरुणकुबेर
 
VI.
 
33
 
नारायणस्य नर
 
IV. 13
 
यस्यां न प्रिय
 
III. 1
 
निद्रां मे निशि
निशितविमल
 
V. 6
 
युक्त भो ! नर
 
I. 17
 
VI.
 
नैवाहं धर्पित
 
III. 14
 
4 युधि जगत्त्रय
येनाहं कृत
 
III. 4
 
VI. 34
 
परभृतगण
 
II. 26
 
यो गाधिपुत्र
 
I.
 
1
 
प्रगृहीतमहा
 
II. 23
 
रघुवरभुज
 
VI.
 
17
 
प्रसीद राजन् !
 
III. 19
 
रज रचित
 
II. 11
 
प्रहस्तप्रमुखा
 
V. 2
 
प्रेपितोऽहं नरे
बलवान् वानरे
बलादेव गृही
 
II. 19
 
I.
 
15
 
रजनिचरशरीर
राक्षसीभिः पार
राजंस्त्वत्कारणा
 
VI. 2
 
II.
 
7
 
IV.
 
9
 
V. 5
 
राजपुत्र ! कुतः
 
IV. 16
 
बाणा: पात्यन्ते
 
VI.
 
5
 
रावणं निहतं
 
VI.
 
18
 
ब्रह्मा ते हृदयं
 
VI.
 
30
 
भवता वानरे
 
I. 20
 
भवता सौम्य
 
I. 18
 
रावणेन विमु
रिपुमुद्धर्तुमुद्यन्तं
रुधिरकलित
 
VI.
 
8
 
IV.
 
4
 
I. 16
 
भवन्तं पद्मप
 
IV. 11
 
लङ्कायां किल
 
IV. 1
 
भवन्त्वरजसो
 
VI. 35
 
लब्ध्वा वृत्तान्तं
 
II. 1
 
मनेयं हि जले
 
VI. 31
 
वज्रभकुम्भतट
 
V. 16
 
VI. 22
 
वरतनु ! तनुगात्रि !
 
II. 17
 
मणिविरचित
 
II. 9
 
वरशरणमुपेहि
 
III. 16
 
मणिविरचित
 
IV. 15
 
वागुराच्छन्नमा
 
I. 19
 
I. 4
 
विकसितशत
 
I.
 
14
 
मदनवशगतो
 
V. 3
 
मम दारापहा
मम शरपार
 
IV. 22
 
IV. 12
 
विकसितशत
 
विज्ञाय देव्या:
व्यक्तमिन्द्रजिता
 
VI. 24
 
VI. 23
 
V. 10
 
मम शरवर
 
IV. 18
 
शक्तिं निपातितां
 
VI. 9
 
५१