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तृती गं
 
प्रगलप्रभृतीनां मीश्वराणां श्रीमद्भिः शोभते पुरीभिः ।
त्रितलं नाम रक्त ( बृ ! मृ)त्तिकं त्रिशिरःशिंशुमारताराक्षमहादानुहादा (लि : मि)-
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मुखादीनां दैत्येन्द्राणां व्यवनस्वरबिराध कुम्भिकोरकामुलानां स
हामणिदचपाण्डर कपिलबिश।विभाणां (!) च दर्शनभवसमृद्ध
पौरवृन्दैरुषोतते ।
चतुर्थ नभस्तितकं नाम पीतमृतिकं कालनेमिगजकर्णकुलराणां सुरद्विषा-
मेक एष सुकुमालिमुझ म्नाञ्च नक्कञ्चराणां चतुर्दशसहस्त्र विहग विशेषाणां


 
4
 
मर्तुश्च काश्यपस्य मरीचि (द ? त) पःप्रमावसम्भृतस्येन्दुम
 
णाद्भुतानुभावलब्ध-
महेन्द्रसख्यस्य यज्ञमगपुरुषवाहन
 
मयस्य भगवतो वैनतेयस्य
 
विभावनीति नगरमुदारशोभमाभरणानि बेदमद्भिः (?)। पञ्चमं वितलं
नाम शक्तिरिमं विरोचनादीनां दानवानां महामेषद्विजिह्ववियुषानां ब
 
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लकृतः स राजकेसरी । मन्त्रिणश्च महिष्या सह विन्ध्यं वनं विन्ध्य-
वासिनी बरिवरयामै गतास्तमानया दुष्प्रवृत्या तत्रैव तनुं त्यक्तबन्त
इति । सा चेयं प्रत्यावृत्त प्राणसंशया भूयोऽपि तेनैव प्रत्याश्वस्यत
दवगतिरप्रमेयाः प्रभावमार्गाः । तथा
 
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साध्वी
 
। दुरवबोचा
 
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हि - (रपो ! कचो) नामामरगुरुतः दसु (?) सम्पीच्या सुरे: (सरास्सणितः !
रहसि निहतः) पाटितोऽपि भगवतो भार्गवेण स्वोदरा (मे ! वे) बोदभाव्यत ।
 
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5. L. about 3 letters
 
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