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आचार्यदण्डिविरचिता
 
तरुणतमालपल्लवस्वस्तरुस्तीर्ण
 
मणिशिलापट्टिका इव रणरतिक्षमाः कीपला: (?)
 
1
 

केचिदनि ... क्रीभूतमापिदाहो सुयमान ( ? ) पाटलमुखपटांशुकाः स्फुरिताशाने-

पल्लवा इव लोकसंहरणदारुणा: प्रलयकालजलघराः, केचिदालम्बितमहावराह .

लीला इव भुवमवाङ्मुखं नित्यदशनकोट्या दारयन्तः, केचिदाह्वयमाना इव

हरी ना कुली कृतमहा महीभृत्कटक ममि (ग) जन्तः केचिदाय (त) हस्तपाद संवेष्टमान-

जनप (टां ! दाः) कालदूता इव परिभ्रमन्तः
 

 
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केचिदुपायनभूतप्रविष्टलोकाला मां(?)
 

 
9
 

 
दुःस्खा दीर्घशूत्कारनिभेन निष्प्रयोजनं जवमिवोद्भिरन्तः केचिदलसानेकपरुष-

बाह्यपरिघभञ्जनसरभसा दशनभङ्गशङ्कया निर्याणभागिनी पाक (?) निष्ठुराङ्कुश के ळि-

भिरवनतपूर्वकायैः सन्यासमाधोरणनिवार्यमाणाः केचिदभिहतभागीरथीतीर-

मित्तिभागोद्धृतधूलिपटलम(न्न ? ग्न) मूर्तयः क्रोधानलधूमधूम्रा इवो..... मसदत्त -

विस्तीर्णमस्तकाघातपात्यमानत्रैत्यानोकहाः प्रतिकुञ्जरसन्निपातयोग्यमिवाचरंतः

स ( क ? ) शंखाः सघण्टापुटा: सडिण्डिमाः सहेम या इव लावण्यमया इव

रागमया इवाहङ्कारमया इव।वष्टम्भमया इव भद्रप्राया मन्दमदधर्मान्वया दुर्मृग-

स्वभावाः कीर्तिमहौषधिहिन... पिक्षितिपालं नयनहारि चक्रश्चकवालमिव

दिशाम।त्मोत्सेधेन संक्षिफ्तो मातङ्गपतयः
 

 
4
 

 

 

 
भीरदी
 

 
विलोचनाः कालमहीविहारिणः कम्रमा
 

 
तांश्च दर्शयन् बलाध्यक्षः क्षितिपतिप. वनप्रजाताः प्रकामाबगाढं
 

 
दारिकांमसकुलुपेतरकालतोययायिनः
 

 
कौशिकीती रकशकाशवन-

तिलौहित्यतीरागरुतयरुत्वचः (!)
 

 
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