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( १५ )
 

 
इस क्षण में हे महाबाहु राम तुम रावणको मारोगे। ऐसा

क​
हकर अगस्त्य जहां से आए थे वहीं लौट गए ॥ २७ ॥

 
एतछ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा ।

धारयामास सुप्रीतो राघवः मप्रयतात्मवान् ॥ २८ ॥
 

 
इतना सुनकर महा तेजस्वी राम का शोक दूर हो गया अर
और
शुद्ध और आत्मवान् होकर प्रसन्नता से उन्होंने इसे धारण

किया ( इसका अनुष्ठान किया ) ॥ २८ ॥
'

 
आदित्य मेदयं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवासप्तवान् ।

त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादय वीर्यवान् ॥.२६ ॥
 

 
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत् ।

सर्वयत्नेन महता वधे तस्यंय धृतोऽभवत् ॥ ३० ॥
॥

 
अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमनाः परममं प्रहृष्यमाणः ।

निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥३१
॥
 
आदित्यका दर्शन करके और इसका जप करके वे बड़े हर्षित
 

होकर​
तीनबार आचमन करके और शुचि होकर वीर्यवान् रामने
बु

आयु
ध​ उठाया। फिर रावणको देखकर हर्षसे भरी हुई आत्मावाले

राम युद्धके लिए चल पड़े। और सब उपायों से बड़े ध्यान से वे

उसके बव​धके लिए लग गये इसी समय देवगणके बीच में से सूर्यने

रावणकी मृत्यु समझकर और रामको देखकर बड़े प्रसन्न ममनसे

हर्षित होते हुए कहा- 'जल्दी करो' ॥ २९-३०-३१ ॥
 
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri