श्रीताण्डवस्तोत्रम् (१)

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नमस्कृत्य रामं महादेवदेवंभवानीकटाक्षेक्षणानन्दजालम् ।तदालोकलोलं महानृत्यलीलंभजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ १ ॥
भवान्तं भजे तं हृदन्ते महान्तंभवाब्धिं तरन्तेन्दुकुन्दावभासम्[भवाब्धेस्तरन्तींदुकूलावभासम् ]।तमीशं रमेशार्चिताङ्घ्रिद्वयाब्जंभजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ २ ॥
जटाजूटसोमं ललाटाक्षभीमंनटाचार्यवामं सदा पूर्णकामम् ।सदावामभामं हृदानन्दरामंभजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ ३ ॥
धराश्रीशवागीशनागेशमुख्यैःसुरैः सेवितं तालवीणादिहस्तैः ।पदाघातसङ्घातसघृष्टदैत्यंभजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ ४ ॥
रणन्नूपुरद्वन्द्वहारि स्वकीयाङ्घ्रि-पद्मद्वयाम्भोरुहापूर्णविश्वम् ।नमन्मध्यसाचीकृतस्वाङ्घ्रिपद्मंभजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ ५ ॥
शिवाशेषबन्धो कृपापूर्णसिन्धोशिवानन्दसन्दोहसन्धानबन्धो ।महाश्चर्यनृत्योल्लसत्पादपद्मंभजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ ६ ॥
कटिप्रान्तसम्बन्धिसौवर्णसूत्रंप्रलम्बप्रकीर्णोरुघण्टानिनादम् ।महासिंहनादं प्रभिन्नाब्दजालंभजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ ७ ॥
भ्रमद्बाहुदण्डं गदा पूर्णरत्नंप्रभो क्षिप्तमार्ताण्डकोटिप्रकाशम् ।महाहीशभूषं सुरेशं महेशंभजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ ८ ॥
महानृत्यसंजातभीमाट्टहासंमहायोगिहृत्पद्मकोशावभासम् ।महानागयज्ञोपवीतावभासंभजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ ९ ॥
भवानीश भूतेश भर्गासुरारेभवारे पुरारे सुरेशार्चिताङ्घ्रे ।न जानाति युष्मत्स्वरूपं जनोऽयंभजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ १० ॥
मुकुन्दाब्जहस्तोल्लसत्द्वेत्रनादैःनमद्देवबृन्दं सुहृद्योगिबृन्दम् ।लसत्कुन्ददन्तं शिवानन्दकन्दंभजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ ११ ॥
जटाजूटगङ्गातरङ्गोर्मिचञ्च-त्सहस्रांम्बुजातावृताकाशमीशम् ।शरच्चन्द्रहासं सुकर्पूरभासंभजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ १२ ॥
स्फुरन्मुद्रिकारत्नराजत्कराङ्घ्रिरणत्स्वर्णकोटीरराजद्भुजौघम् ।लसन्मध्यसम्बद्धपट्टाभिरामंभजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ १३ ॥
स्फुरन्तं नदन्तं महान्तं दिगन्तंवसन्तं महाश्चर्यवासो नितान्तम् ।अनन्तं भवान्तं भवनीहृदन्तंभजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ १४ ॥
महादेव देवादिदेवेश शम्भोभवन्तं विना देवमन्यं न जाने ।क्षणाराधनेनाशुतोषं महेशंभजे पार्वतीशं महाताण्डवेशम् ॥ १५ ॥
नमस्ते नमस्ते शिवानन्दकीर्तेनमस्ते नमस्ते भवानन्दमूर्ते ।नमस्ते नमस्ते शरण्यैकमूर्तेनमस्ते नमस्ताण्डवाडम्बराय ॥ १६ ॥
नमस्ते नमस्ते जगज्जन्मकर्त्रेनमस्ते नमस्ते नमः फालनेत्र ।नमस्ते नमस्ते हरायाघहर्त्रेनमस्ते नमस्ताण्डवाडम्बराय ॥ १७ ॥
नमः पार्वतीप्राणनाथाय तुभ्यंनमः सर्वलोकैकनाथाय तुभ्यम् ।नमो विष्णुहृत्पद्मकोशाय तुभ्यंनमस्ते नमस्ताण्डवडम्बराय ॥ १८ ॥
नमो दिव्यकैलासवासाय तुभ्यंनमो दिव्यरत्नाहिभूषाय तुभ्यम् ।नमः सर्वयज्ञोपवीताय तुभ्यंनमस्ते नमस्ते नमः शङ्कराय ॥ १९ ॥
नमः शम्भवे टङ्कवत्राङ्कितायनमो भक्तलोकैकपालाय तुभ्यम् ।इदं धूर्जटेस्ताण्डवस्तोत्रराजं[प्रभाते] पठन्ति प्रसन्नान्तरङ्गाः।सुरेन्द्रादिभोगानिहैवास्य भुक्त्वातदन्ते लभन्ते शिवानन्दलोकम् ॥ २० ॥
॥ इति श्रीताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥