माला का द्वितीय कमल
श्रीसूक्त
और
आदित्यहृदय स्तोत्र
संग्रहकर्ता और अनुवादक
कमला
प्रकाशक -
तुलसी मीमांसा परिषद्, भदैनी, काशी ।
मुद्रक-
पं० पद्मनारायण आचार्य
पद्म प्रेस, वांसफाटक, काशी ।
प्रथमावृत्ति १००० ] सन् १९४०
[ मूल्य =)
विषय सूची
भूमिका में पाठ करने की विधि
१. श्रीसूक्त
२. लक्ष्मीसूक्त
३. लक्ष्मीस्तोत्र
४. गणेशाष्टक
५.आदित्यहृदय
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देवकृतलक्ष्मी स्तोत्रम्
क्षमस्वभगवत्यंब क्षमाशीले परात्परे ।
शुद्धसत्वस्वरूपे च कोपादिपरिवर्जिते ॥ १ ॥
हे भगवती मा मुझे क्षमा करो तुम क्षमा शील हो बड़े से भी
बड़ी हो ( पिता विष्णु से भी बड़ी हो ), शुद्धसत्त्व ही तुम्हारा स्वरूप है ( तुम में रजोगुण और तमोगुण नाम के लिए भी नहीं है), क्रोध, लोभ आदि दोषों से तुम बहुत दूर हो ॥ १ ॥
उपमे सर्वसाध्वीनां देवीनां देवपूजिते ।
त्वया विना जगत्सर्वे मृततुल्यं च निष्फलम् ॥ २ ॥
तुम सब अच्छी ( साध्वी ) स्त्रियों की उपमा हो, देवताओं ने भी तुम्हारी पूजा की है। तुम्हारे बिना सारा जगत् मुर्दा के समान और निष्फल है ॥ २ ॥
सर्वसंपत्स्वरूपा त्वं सर्वेषां सर्वरूपिणी ।
रासेश्वर्यधिदेवी त्वं त्वत्कलाः सर्वयोषितः ॥ ३ ॥
तुम सभी प्रकार की संपत्ति का स्वरूप हो, हर एक के लिए चाहे जिस रूप को तुम रास की रानी और मालकिन हो, सभी स्त्रियां तुम्हारी कला मात्र है ॥ ३ ॥
कैलासे पार्वती त्वं च क्षीरोदे सिन्धुकन्यका
स्वर्गे त्वं च महालक्ष्मीमर्त्यलक्ष्मीश्च भूतले ॥ ४ ॥
कैलाश पर तुम पार्वती हो, क्षीर सागर में तुम लक्ष्मी हो, स्वर्ग में तुम महालक्ष्मी हो, और पृथ्वी पर नारी रूपा लक्ष्मी हो ॥ ४ ॥
वैकुंठे च महालक्ष्मीर्देवदेवी सरस्वती ।
गंगा च तुलसी त्वं च सावित्री ब्रह्मलोकतः ॥ ५ ॥
बैकुंठ में तुम महालक्ष्मी महादेव को देवी और सरस्वती हो, तुम्ही गंगा, तुलसी और सावित्री हो ॥ ५ ॥
कृष्णप्राणाधिदेवी त्वं गोलोके राधिका स्वयम्
रासे रासेश्वरी त्वं च वृंदावनवने वने ॥ ६ ॥
तुम्ही कृष्ण की प्राणाधिदेवी हो, तुम्हीं गोलोक में स्वयं राधि- का हो तुम्ही वृन्दावन के वन में रासकी रासेश्वरी हो ॥ ६ ॥
कृष्णप्रियां त्वं भांडीरे चन्द्रा चन्दन कानने ।
विरजा चंपकवने शतशृगे च सुन्दरी ॥ ७ ॥
तुम भांडीर में कृष्ण की प्रिया हो चन्दन के वन में चन्द्रा हो चंपक वन में विरजा हो और शतशृंग में सुंदरी हो ॥ ७ ॥
पद्मावती पद्मवने मालती मालतीवने ।
कुन्ददन्ती कुन्दवने सुशीला केतकीवने ॥ ८ ॥
पद्मवन में पद्मावती, मालती वन में मालती, कुंदवन में कुंददन्ती और केतकी वन में सुशीला हो ॥ ८ ॥
कदंबमाला त्वं देवी कदंबकाननेऽपि च ।
राजलक्ष्मी राजगृहे गृहलक्ष्मी गृहेगृहे ॥ ६ ॥
हे देवि तुम कदंब कानन में कदंब माला हो, राजगृह में राज- लक्ष्मी और घर घर में गृह लक्ष्मी हो ॥ ९ ॥
इत्युक्त्वा देवताः सर्वा मुनयोमनवस्तथा ।
रुरुदुर्नम्रवदनाः शुष्ककंठोष्ठ तालुकाः ॥ १० ॥
ऐसा कह कर सभी देवता, मुनि और मनुष्य रोपड़े, वे मुख नीचे किए हुए थे और उन के कंठ, ओठ और तालू सूख गएथे ॥१०॥
इति लक्ष्मीस्तवं पुण्यं सर्वदेवैः कृतं शुभम् ।
यः पठेत्प्रातरुत्थाय स वै सर्वं लभेद् ध्रुवम् ॥ ११ ॥
इस प्रकार जिस पुण्य लक्ष्मी स्तव की सब देवताओं ने किया था उसे जो सबेरे उठकर पाठ करेगा वह निश्चय ही सब कुछ पावेगा ॥ ११ ॥
अभार्यो लभते भार्या विनीतां सुसृतां सतीम् ।
सुशीलां सुन्दरीं रम्यामतिसुप्रियवादिनीम् ॥ १२ ॥
पुत्रपौत्रवतीं शुद्धां कुलजां कोमलांवराम् ।
अपुत्रो लभते पुत्रं वैष्णवं चिरजीवनम् ॥ १३ ॥
परमैर्श्ययुक्तं च विद्यावंतं यशस्विनम् ।
भ्रष्टराज्यो लभेद्राज्यं भ्रष्टश्रीर्लभते श्रियम् ॥ १४ ॥
हतबन्धुर्लभेद्बन्धुं धनभ्रष्टो धनं लभेत् ।
कीर्तिहीनो लभेत्कीर्ति प्रतिष्ठा च लभेद् धुवम् ॥ १५ ॥
सर्वमंगलदंस्तोत्रं शोकसंतापनाशनम् ।
हर्षानंदकरंशश्वद्धर्ममोक्ष सुहृत्प्रदम् ॥ १६ ॥
स्त्री हीन मनुष्य विनीत और पुत्र वाली, सती, सुशील, सुंदर, रम्य और मीठा बोलनेवाली, शुद्ध, कुलीन, कोमल वस्त्रों वाली स्त्री. पाता है और पुत्र हीन चिरजीवी वैष्णव पुत्र पाता है। जो परम ऐश्वर्य युक्त, विद्यावाला और यशस्वी हो । भ्रष्ट राज्य मनुष्य राज पाता है और भ्रष्ट श्री अपनी खोई श्री को पा जाता है। भाई हीन भाई की और धन हीन धन पाता है। कीर्ति हीन कीर्ति और प्रतिष्ठा को पाता है। यह सर्व मंगलों को देनेवाला स्तोत्र शोक संतापका नाश करता है, हर्ष और आनंद बढ़ाता है, धर्म, मोक्ष और मित्रों को देता है । १२-१३-१४-१५-१६ ॥
इति श्रीदेवकृतं लक्ष्मीस्तोत्रं समाप्तम्
गणेशाष्टकम्
यतोऽनंतशक्तेरन्ताश्चजीवा यतो निर्गुणादप्रमेया गुणास्ते ।
यतो भाति सर्वं त्रिधा भेदभिन्नं सदा तं गणेशं नमामो भजामः १
जिस की शक्ति का कोई अन्त नही है, जिस से अनन्त जीव उत्पन्न हुए हैं, जो ( स्वयं ) निर्गुण है पर जिस से तेरे असंख्य गुण उत्पन्न हुए हैं, जिस के कारण ही यह सब ( जगत् ) सत्त्व, रज, तम के तीन भेदों में बंटा हुआ मालुम पड़ता है उस गणेश को सदा प्रणाम करते हैं ॥ १ ॥
यतश्चाविरासीज्जगत्सर्वमेतत्तथान्जासनो विश्वगो विश्वगोप्ता तथेंद्रादयो देवसंघा मनुष्याः सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥२॥
जिस से यह सब जगत् उत्पन्न हुआ था, स्वयं ब्रह्मा, और विश्व व्यापी विष्णु उत्पन्न हुए, और जिस से इन्द्रादि देव संघ के साथ मनुष्य भी उत्पन्न हुए उस गणेश को प्रणाम करता हूं, भजता हूँ ॥ २ ॥
यतो वह्निभानू भवो भूर्जलं च यतः सागराचंद्रमा व्योम वायुः ।
यतः स्थावरा जंगमा वृक्षसंघाः सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥३॥
जिस से अग्नि, सूर्य, शंकर, पृथिवी, जल, सागर, चन्द्रमा, आकाश, वायु उत्पन्न हुए हैं जिससे स्थावर और जंगम, ( सभी प्रकार के ) वृक्ष उत्पन्न हुए हैं उस गणेश को हम सदा प्रणाम करते हैं और भजते हैं ॥ ३ ॥
यतो दानवाः किन्नरा यक्षसंघा यतश्चारणा वारणाः श्वापदाश्च यतः पक्षिकीटा यतो वीरुधश्च सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥४॥
जिससे दानव, किन्नर, यक्ष, चारण, वारण ( हाथी ) श्वापद
(शिकारी पशु ) पक्षी, कीडे और लताकी उत्पत्ति हुई है उस गणेश को हम नमस्कार करते और सदा भजते हैं ॥ ४ ॥
यतो बुद्धिरज्ञाननाशो मुमुक्षोर्यतः संपदो भक्तसंतोषिकाः स्युः।
यतो विघ्ननाशो यतः कार्यसिद्धिः सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥५॥
जिस से मुमुक्षु को बुद्धि होती है और अज्ञान का नाश होता है, जिस से भक्त का संतोष देनेवाली संपदाएं उत्पन्न होती है। जिस से विघ्न नाश होता है, जिस से कार्य की सिद्धि होती है सदा हम उसी गणेश को ॥ ५ ॥
यतः पुत्रसंपद्यतो वाञ्छितार्थो यतोऽभक्तविघ्नास्तथाऽनेकरूपाः यतः शोकमोहौ यतः काम एव सदा तं गणेशं नमामो भजामः ।६।
जिस से पुत्र की संपदा मिलती जिस से मन चाही चीज मिलती है, जिस से अभक्तों को बहुत प्रकार के विघ्न होते हैं जिस से शोक मोह होते हैं जिस से काम उत्पन्न होता है उसी गणेश को ॥ ६ ॥
यतोऽनंतशक्तिः स शेषो बभूव घराधारणेऽनेक रूपे च शक्तः ।
यतोऽनेकधा स्वर्गलोका हि नाना सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥ ७ ॥
जिस से अनंत शक्तिवाले शेष उत्पन्न हुए थे जो अनेक रूप से पृथिवी को धारण करते हैं । जिस से अनेक प्रकार के स्वर्ग उत्पन्न हुए हैं उसी गणेश का हम नमस्कार करते हैं ॥ ७ ॥
यतो वेदवाचो विकुंठा मनोभिः सदा नेति नेतीति यत्ता गृणंति ।
परब्रह्मरूपं चिदानंदभूतं सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥ ८॥
जहां वेद की ऋचाएं भी कुंठित हो जाती हैं और वे भी जिसे नेति नेति कह कर सदा बखानती हैं उस परब्रह्म रूप और चिदानंद स्वरूप गणेश की हम सदा नमस्कार करते और भजते हैं ॥ ८ ॥
पुनरूचे गणाधीशः स्तोत्रमेतत्पठेन्नरः ।
त्रिसंध्यं त्रिदिनं तस्य सर्वकार्ये भविष्यति ॥ ६९ ॥
फिर गणेश जी बोले, इस स्तोत्र का तीनो सन्ध्याओं में तीन दिवस तक पाठ करने वाले के सब कार्य सिद्ध हो जांयगे ॥ ९ ॥
यो जपेदष्टदिवसं श्लोकाष्टकमिदं शुभम् ।
अष्टवारं चतुर्थ्यो तु सोऽष्टसिद्धीरवाप्नुयात् ॥ १० ॥
इन कल्याणप्रद आठ श्लोकों का आठ दिवस तक या चतुर्थी को ही आठ बार पाठ करने वाले को अष्ट सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं ॥ १० ॥
यः पठेन्मासमात्रं तु दशवारं दिनेदिने ।
स मोचयेद्बंन्धगतं राजवध्यं न संशयः ॥ ११ ॥
एक महीने तक प्रतिदिन दस बार पाठ करने से राजशासना- नुसार वध दण्ड के योग्य बन्दी को भी छुड़ा लेता है ॥ ११ ॥
विद्याकामो लभेद्विद्यां पुत्रार्थी पुत्रमाप्नुयात् ।
वांछिताँल्लभते सर्वानेकविंशतिवारतः ॥ १२ ॥
यो जपेत्परया भक्त्या गजाननपरो नरः ।
एवमुक्त्वा ततो देवश्चांन्तर्धानं गतः प्रभुः ॥ १३ ॥
भक्ति-पूर्वक श्रीगणेश का भजन करते हुए इस स्तोत्र के इक्कीस आवृत्तियों से, विद्यार्थी विद्या, पुत्र की कामना करने वाला पुत्र, तथा अन्य पदार्थों की इच्छा रखने वाला इष्ट वस्तु, प्राप्त कर लेता हैं। समर्थ श्रीगणेश देव इस तरह फल श्रुति कहने के बाद अन्तर्धान होगये ॥ १२-१३ ।
इति श्री गणेश पुराणे उपासना खण्डे गणेशाष्टकं सम्पूर्णम्
आदित्य हृदयम्
ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् ।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ॥ १ ॥
राम युद्ध करते करते थक गए थे। रावण को अपने सामने युद्ध के लिए तैयार देखकर वे चिन्तासे युद्धस्थल में खड़े थे ॥ १ ॥
दैवतैश्च समागम्य दृष्टुमभ्यागतो रणम् ।
उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्योभगवानृषिः ॥ २ ॥
देवताओं के साथ रण देखने को भगवान् अगस्त ऋषि भी आए हुए थे। वे राम के पास जाकर बोले ॥ २ ॥
राम राम महाबाहो श्रुणु गुह्यं सनातनम् ।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि ॥ ३ ॥
हे राम, तुम्हारी बाहें तो बहुत बड़ी है (तुम बहुत बली हो पर) मैं एक पुराना रहस्य बताता हूँ उसे सुनो जिस से, बेटा, तुम युद्ध में सब शत्रुओं को जीत सकोगे ॥ ३ ॥
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् ।
जयावहं जपेन्नित्यमक्षयं परमं शिवम् ॥ ४ ॥
आदित्य हृदय स्तोत्र पुण्य कर और सभी प्रकार के शत्रुओं को नाश करनेवाला है। ऐसे परम शिव और जय लाने वाले अक्षय्य स्तोत्र का नित्य जप करना चाहिए ॥ ४ ॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम् ।
चिन्ताशोकमशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ॥ ५ ॥
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् ।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ॥ ६ ॥
तुम उदय होते हुए सूर्य की पूजा करो। वह सभी मंगल मागल्यों से भरे हुए है, सब पापो के नाशन हैं, चिन्ता और शोकके मिटानेवाले आयु के बढाने वाले और सब से ऊपर रहने वाले (उत्तम) है। वे किरणमय है, देवता और असुर सभी उनको नमस्कार करते हैं, वे प्रकाश करनेवाले विवस्वान् और भुवनों के ईश्वर हैं ५/६
सर्वदेवात्मकोह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः ।
एष देवांसुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः ॥ ७ ॥
यह तेजस्वी रश्मि भावन सूर्य सभी देवताओं की आत्मा हैं। यह देवासुरों तथा अन्य लोगों को अपनी किरणों से पालते हैं ॥ ७॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः ।
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमोह्यांपतिः ॥ ८ ॥
यही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द प्रजापति, महेन्द्र, धनद ( कुबेर ), काल, यम सोम और जल के पति ( वरुण ) हैं ॥ ८ ॥
पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः ।
वायुर्वह्निः प्रजाप्राणः ऋतुकर्ता प्रभाकरः ॥ ६९ ॥
यही पितृगण, वसुगण, साध्यगण, दोनों अश्विनी कुमार, मन- द्गण और मनु हैं। यही बायु, अग्नि, प्रजाप्राण, ऋतुकर्त्ता और प्रभाकर हैं ॥ ९ ॥
आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान् ।
सुवर्णसदृशो भानुः स्वर्णरेता दिवाकरः ॥ १० ॥
हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान् ।
तिमिरोन्मथनः शंभ्रुस्त्वष्टा मार्तण्ड अंशुमान् ॥ ११ ॥
हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रवि ।
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः ॥ १२ ॥
आदित्य, सविता, सूर्य, खग, पूषा, गभस्तिमान्, सुवर्ण के समान, भानु और स्वर्णरेता, दिवाकर हैं। यही हरिदश्व, सहश्रार्चि सप्त सप्ति, मरीचिमान, तिमिरोन्मथन शंभु, त्वष्टा, मार्तण्ड, अंशु- मान्, हिरण्यगर्भ, शिशिर, तपन, भास्कर, रवि, अग्निगर्भ, अदिति का पुत्र, शङ्ख और शिशिर नाशन हैं ॥ १०-११-१२ ॥
व्योमनाथस्तमोभेदि ऋग्युजुः सामपारगः ।
घनदृष्टिरपां मित्रं विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः ॥ १३ ॥
यही व्योमनाथ, तमोभेदी और ऋग्यजुः साम ( तीनों वेदके पारंगत विद्वान्) यही घन वृष्टि, अपां मित्र और विन्ध्याटवी के ऊपर उछलनेवाले हैं ॥ १३ ॥
आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः ।
कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोद्भवः ॥ १४ ॥
यही आतपी, मण्डली, मृत्यु, पिङ्गल, सर्वतापन, कवि, विश्व, महातेजा, रक्त और सर्वभवोद्भव हैं ॥ १४ ॥
नक्षत्रग्रहतारणामधिपो विश्वभावनः ।
तैजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्नमोऽस्तुते ॥ १५ ॥
यही नक्षत्र, ग्रह और ताराओंके राजा और विश्व की भावना ( स्थिति ) के कारण हैं। यह तेजोंमें तेजस्वी है, हे द्वादशात्मन्, तुम्हें नमस्कार है ॥ १५ ॥
नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः ।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ॥ १६ ॥
पूर्व गिरि को नमस्कार, पश्चिमी पहाड़ को नमस्कार और ज्योतिगणोंके पति तथा दिन के अधिपति को नमस्कार है ॥ १६ ॥
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः ।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः ॥ १७ ॥
नमः उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः ।
नमः पद्मप्रबोधाय मार्तण्डाय नमो नमः ॥ १८ ॥
जय, जयभद्र और हर्यश्वको नमस्कार । हे सहस्रांशो नमो नमः । आदित्य को मेरा नमस्कार है। उग्र वीरको, सारङ्गको पद्म प्रबोध और मार्तण्डको मेरा नमस्कार है ॥ १७-१८ ॥
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यादित्यवर्चसे ।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः ॥ १९ ॥
ब्रह्मा इशान और अच्युतके ईश, सूर्य, आदित्यवर्चस, भगवान्, सर्वभक्ष और, रौद्र शरीरको नमस्कार ॥ १९ ॥
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने ।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः ॥ २० ॥
तम, हिम और शत्रुके नाश करनेवाले अमितात्मा वाले , कृतघ्नको मारनेवाले देव और ज्योतियोंके पतिको नमस्कार ॥२७॥
तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे ।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रवये लोकसाक्षिणे ॥ २१ ॥
तपे हुए सोने के समान शोभावाले, वहन करनेवाले, विश्वकर्मा, तमको नाश करनेवाले, लोकके साक्षी रविको नमस्कार ॥ २१ ॥
नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः ।
पाययत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ॥ २२ ॥
यही उपन्न सृष्टिको नाश करते हैं और उसीके फिर वही प्रभु
उत्पन्न करते हैं। यही अपनी किरणों से पिलाते हैं यही तपते हैं और यही बरसते हैं ॥ २२ ॥
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः ।
एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ॥ २३ ॥
यह सव प्राणियों के सो जाने पर सबके भीतर बैठे हुए जागते रहते हैं। यह अग्निहोत्र हैं और यही अग्निहोत्रियों के फल हैं ॥ २३ ॥
वेदाश्च क्रतवश्चैव ऋतूनां फलमेव च ।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः ॥ २४ ॥
वेद, ऋतु, ऋतुका फल, और लोगों में जो कृत्य होते हैं वह सब कुछ यही रवि प्रभु हैं ॥ २४ ॥
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च ।
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ॥ २५ ॥
हे राघव, आपत्ति, कठिनाई, जंगल, और भयमें इनका नाम लेनेसे कोई भी पुरुष दुःखी नहीं होता ॥ २५ ॥
पूजयस्वेनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम् ।
एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥ २६ ॥
एकाग्र होकर इन जगत्पति देवदेवकी पूजा करो। इस स्तोत्र का तीन बार जप करने पर युद्धोंमें विजयी हो जाओगे ॥ २६ ॥
अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि
एवमुक्त्वा तदागस्त्यो जगाम च यथागतम् ॥ २७ ॥
इस क्षणमें हे महाबाहु राम तुम रावणको मारोगे। ऐसा कहकर अगस्त्य जहां से आए थे वहीं लौट गए ॥ २७ ॥
एतछ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा ।
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान् ॥ २८ ॥
इतना सुनकर महा तेजस्वी राम का शोक दूर हो गया और शुद्ध और आत्मवान् होकर प्रसन्नता से उन्होंने इसे धारण किया ( इसका अनुष्ठान किया ) ॥ २८ ॥
आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान् ।
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादय वीर्यवान् ॥ २९ ॥
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत् ।
सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत् ॥ ३० ॥
अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः ।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥३१॥
आदित्यका दर्शन करके और इसका जप करके वे बड़े हर्षित होकर तीनबार आचमन करके और शुचि होकर वीर्यवान् रामने आयुध उठाया। फिर रावणको देखकर हर्षसे भरी हुई आत्मावाले राम युद्धके लिए चल पड़े। और सब उपायों से बड़े ध्यान से वे उसके वधके लिए लग गये इसी समय देवगणके बीच में से सूर्यने रावणकी मृत्यु समझकर और रामको देखकर बड़े प्रसन्न मनसे हर्षित होते हुए कहा- 'जल्दी करो' ॥ २९-३०-३१ ॥
सूक्तों और ग्तोत्रों के कई शब्दों में मर्म रहता है घंट हरण के लिए श्रीसूक्त में करीषिणी, कर्दम, चिक्कीत, जातवेदो आि शब्द हैं। इनको समझाने के लिए टिप्पणो आवश्यक थी स्थान और समय नहीं है। केवल एक बात अवश्य जान लेने चाहिए कि ऐसे मर्म भरे शब्द तीन प्रकार से समझे जाते हैं- ( ३० ) टिप्पणी
१. साहित्यिक विवेचना और व्याख्या से ( कोष, निरुत्त उपाख्य आदि से )
अनुभवी विद्वानों और संतों के सत्संग से
और स्वयं अपनी आत्मानुभूति से
२.
३.
-:*:- CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri